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एडमीशन


जहाॅ से कक्षा-8 उत्तीर्ण हुआ वहाॅ पर उच्च का अभाव होने के कारण कक्षा-9 में मेरे द्वारा जनता हायर सेकेन्ड्री स्कूल, खड़ौहाॅ मलिहाबाद, लखनऊ में लिया गया, क्योंकि मेरे बड़े भाई और गांव के अन्य बच्चे पहले से ही वहाॅ पढ़ने जाते थे, इसी कारण मेरा भी नाम वहीं पर लिखवा दिया गया।
नाम लिखवाने में क्या-क्या कठिनाइयाॅ आयी, यहाॅ उसका भी थोड़ा उल्लेख कर रहा हॅू। उस समय लगभग-20-25 कि0मी0 के दायरे में कही भी हायर सेकन्ड्री स्कूल नहीं थ,े इस कारण कक्षा आठ पास करने के बाद कक्षा-9 में नाम लिखवाना बड़े स्कूलों में काफी कठिनाईयाॅं होती थी, क्योंकि सीटे कम और बच्चे ज्यादा होते थे। इस कारण वहाॅ पर पहले एक सामान्य ज्ञान की लिखित परीक्षा होती थी, तभी वहां पर एडमीशन होता था और उसी आधार पर सेक्शन-ए एव ंबी तथा सी में नाम लिखा जाता था। सेक्शन ए में दाखिला लेने के लिए अंग्रेजी लेना आवश्यक होता था और अंग्रेजी लेने के लिए उसकी अलग से परीक्षा होती थी। उक्त परीक्षा में मैं बैठा और पास हो गया, उसी आधार पर मेरा नाम ए सेक्शन में हो गया परन्तु मेरे मित्र चन्द्र प्रकाश का एडमीशन ए सेक्शन में नहीं हुआ तो उन्होंने अपने गांव के एक दबंग किस्म के ठाकुर से स्कूल के प्रधानाचार्य पर दबाव बनाकर मेरा नाम ज्ञान कटवा कर अपना चन्द नाम मेरे नाम के आगे लिखवा लिया और मेरा नाम कट गया, परन्तु मेरे नाम कटने की जानकारी मुझे लगभग एक माह बाद मिली और मैं स्कूल रोज जाता था परन्तु किसी ने मुझे नहीं बताया कि आपका नाम कट गया है।
जब मुझे अपने नाम कटने की जानकारी हुई तो मैंने अपने बड़े भाई साहस व घर में पिता जी को बताया तो वे बहुत दुखी हुए और कहा कि तुम स्कूल नहीं जाते होगे, तभी तो तुम्हारा नाम कट गया है। मैंने कहा कि मैं स्कूल रोज जाता हॅू परन्तु क्लास टीचर मेरी हाजिरी नहीं लगा रहे हैं। पता करने पर बताया गया कि आपका नाम कट चुका है और दोबारा नाम फिर से लिखवाओ और पुनः फीस जमा करो।
जब कई दिन बाद पुनः नाम लिखवाने गये, तो बताया गया कि आपकी टी0सी भी गायब हो चुकी है, अब आपका नाम नहीं लिख पायेगा। यह खबर सुनकर मैं बहुत ही घबरा गया और सोचा अब क्या होगा और घर में सबको क्या जवाब देगें कि स्कूल में सारे कागज भी गायब हो गये हैं और इसीलिए अब तुम्हारा नाम दोबारा नहीं लिखा जायेगा। स्कूल की घटना जब मैंने पिता से बतायी, तो उन्होंने हमें बहुत ही डांटा और कहा कि अब तुम्हारा दोबारा नाम नहीं लिखवायंेगें, अब तुम घर पर गाय-भैंस चराओ, यह सुनकर मैं बहुत ही दुखी हुआ और कइ्र्र दिन तक रोता रहा।
तीन दिन बाद मेरी दादी ने कहा कि मेरे कुछ जेवरात रखे हुए हैं उन्हें सुनार के यहाॅ गिरवी रख कर कुछ पेसे ले आओ और बच्चे का नाम लिखवाओ, तब पिता जी मेरी दादी की जेवरात लेकर गढ़ौवाॅं में लोहार के पास 20 रू0 में गिरवी रखकर नाम लिखवाने के लिए गये, स्कूल पहुंच कर प्रधानाचार्य से मिले तो प्रधानाचार्य ने कहा कि अब दूसरी टी0सी0 लानी होगी, क्योंकि इनकी टी0सी0 कहीं गायब हो गयी, स्कूल में मिल नहीं रही है और जाओ जहाॅ सेे आपके बच्चे ने कक्षा आठ पास किया है वहीं से आप दूसरी टी0सी0 कटवा कर जमा कीजिए तब ही आपके बच्चे का नाम पुनः लिखा जायेगा अब मेरे पिता जी पढ़े लिखे तो थे नहीं? इस कारण उनके लिए तो दूसरी टी0सी0 कटवाना काफी कठिनाई दिखायी दी और सोचा अब कैसे यह दूसरी टी0सी0 मिलेगी।
खैर दूसरे दिन मेरे पिता जी और मै दोनों लोग अपने पुराने स्कूल बाबा हुलासी दास शिक्षा संस्थान, मवईकलाॅ के लिए सबेरे पैदल ही चल दिये और चलते-चलते ग्यारह बजे स्कूल पहंुच,े तो वहाॅ के प्रधानाचार्य ने कहा कि पहले तहसील से शपथ पत्र बनवाकर लाओ, उसके बाद ही दूसरी टी0सी0 मिलेगी। पिता जी ने प्रधानाचार्य से पूछा कि शपथ पत्र क्या होता ह,ै इस पर प्रधानाचार्य ने कहा कि तहसील में वकील के पास जाओं वह सब बता देगा। उस स्कूल से मलिहाबाद की दूरी लगभग 17-18 मि0मी0 होगा, हम लोगों के पास कोई रास्ता नहीं दिख रहा था कि अब मलिहाबाद कैसे जाया जाये और आज ही शपथ पत्र लाना होगा। हम और मेरे पिता जी दोनों लोग स्कूल से पैदल ही रहीमाबाद गये और वहाॅ से तांगे पर बैठकर मलिहाबाद के लिए रवाना हो गये, मलिहाबाद पहंुचते-पहुचते शाम के 5 बज गये और उस दिन तहसील बन्द हो गयी, अब हम लोग वहाॅ जैसे-तैसे पहुंचे परन्तु कार्य नहीं हुआ हमारे पिता जी बहुत दुखी हुए और कहा कि चलो आज कार्य नहीं होगा तो चलो तुम्हारे मामा का गांव यहाॅ तहसील से लगभग 4 कि0मी0 की दूरी पर है, वहीं पर चलते हैं और कल आ कर शपथ-पत्र बनवाया जायेगा।
हम दोनों लोग पैदल ही मामा जी के गांव गये और वही रात भर रूके। सुबह दूसरे दिन तहसील आकर वकील से शपथ-पत्र बनवाया जिस पर खर्चा रू0 5 आ गया जबकि उस समय शपथ-पत्र के 2रू0 खर्च आता था परन्तु जानकारी न होने पर दलाल ने बीच मं 2 रू0 खा गया। शपथ पत्र बनवाकर पिर मलिहाबाद से रहीमाबाद स्कूल गया तो पता चला कि आज प्रधानाचार्य साहब नही आये है और टी0सी0 अब कल कटेगी, यह सुनकर पिता जी का शरीर सुन्न हो गया और वहीं जमीन पर सर पकड़कर बैठ गये, यह देखकर मैं भी बहुत दुखी हुआ कि अब कैसे टी0सी0 मिलेगी, उसके बाद हम लोग पैदल ही अपने गांव शाम को वापस आ गये। दूसरे दिन मैं खुद अकेले ही पैदल स्कूल गया और दो रूपये देकर दूसरी टी0सी0 बनवाकर वापस घर आया, अगले दिन स्कूल जाकर पुनः कक्षा 9 में एडमीशन कराया, जब जाकर मेरी कक्षा 9 की पढ़ाई चालू हुई।
वर्ष 1982 में कक्षा-9 उत्तीर्ण हुए और कक्षा 10 की पढ़ाई चालू हो गयी वहाॅ पर कई और हमारे नये दोस्त भी बन गये। गांव से 5-6 लोग जाते थे और दिरपाल खेड़ा से तथा दलनखेड़ा, एकघरा, खोदिहन खेड़ा, रामपुर, गढ़ौवा यह सब रास्ते में ही गांव पड़ते थे। स्कूल पहुंचते-पहंुचते लगभग 20-25 बच्चे हो जाते थे, उसमें काफी दोस्त बन गये, रोज साथ आते-जाते थे बहुत ही मजा आता था रास्ते में गन्ना, गाजर, चना, अमरूद एवं जाड़े के सीजन में बेर आदि स्कूल से लौटते वक्त खेतो से चुराकर खूब खाते थे और रास्ते में मैच, कबड्डी, गुल्ली डण्डा इत्यादि और कई तरह के खेल आपस में मिल कर खूब खेलते थे। आज वह दिन याद करके आॅखों में आॅसू आ जाते है कि क्या वह दिन थे मस्ती भरे, एक वर्ष बीत गया पता ही नही चला और बोर्ड की परीक्षाएं आ गयीं ।
                                         
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