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बैल की खाल


भादों का महीना था, आज चार दिन बाद बरसात बन्द हुई, चारो तरफ पानी ही पानी नजर आ रहा है, जिधर देखो यह मालूम नहीं हो रहा है कि कौन खेत है और कौन तालाब, अंदाजा लागाना मुश्किल हो रहा, गांव में हर तरफ कीचड़ ही कीचड़ भरा हुआ है, कहीं से निकलना आसान नहीं था।
शाम के लगभग 7.00 बज रहे थे, मैं भी अपने गाय-भैंसों के साथ खेत से घर को वापस आ रहा था, तभी कमीनों (मरे हुए जानवर उठाने वाले) के मोहल्ले से काफी जोर-जोर से कई लोगों के लड़ने-झगड़ने की आवाजें आ रही थी। अपने घर के पास पहंुचा तो देखा कि मेरी गली के आगे वाली गल्ली में मोहल्ले के पुरूष, महिलाएं एवं बच्चे काफी संख्या में इक्ट्ठा हुए नजर आये, मैं भी शोर-शराबा सुनकर भीड़ के पास पहुंच गया, देखा कि कई लोग एक बैल, जो दुबला-पतला, मरियल सा बहुत ही बीमारी की हालत में भीड़ के बीचो-बीच बड़ी मुश्किल से खड़ा हो पा रहा था, को घेरे हुए लोग खड़े हुए हैं।
मैं भी कौतूहलवश वहाॅ पर खड़े एक बुजर्ग से पूछा कि दादा जी क्या हुआ और इस बैल को क्यों इतने लोग घेरे हुये खड़े हैं और कई लोग आपस में झगड़ा भी कर रहे हैं, क्या माजरा है। इस पर वहाॅ पर उपस्थित कई बुजर्गोंं ने हमें बताया कि अभी तुम छोटे हो इस मामले को नहीं समझ सकते। परन्तु मैं पास ही खड़े अपने काका से पूछा तो उन्होंने बताया कि यहां पर चार लोग मिलकर पूरी ग्राम पंचायत में मरे हुए जानवरों को उठाने का कार्य करते हैं और उनकी खाल उतार कर बाजार में बेंचते हैं, फिर खाल बेंचकर चारों लोग बराबर हिस्सा बांट लेते हैं।
आज जो मरियल और बीमार बैल को तुम देख रहे हो उसी में से एक साझीदार ने चालकी से उस बैल के मालिक से मात्र 15 रू0 में इसे खरीद लिया है और फिर इस बैल को बरसात में खुले आसमान के नीचे किसी पेड़ से बांध देगा और बिना चारा-पानी के दो दिन बाद यह बैल अपने आप ही मर जायेगा और उसकी खाल जो बाजार में बिकेगी वह पैसे उसे अकेले ही मिल जायेगंे यदि यही बैल बेचने वाले के पास ही मरता तो उसकी खाल के पैसे चारों लोगों में बंटते, इसलिए चालाकी से एक साझेदार उसे पहले ही खरीद कर अपना बैल बना लिया जिससे और तीन लोगों को उसकी खाल में बंटवारा न करना पड़े, इसी बात को लेकर आपस में झगड़ा हो रहा है।
इससे अंदाजा लगया जा सकता है कि उस समय गरीबी और अशिक्षा का कितना अभाव था कि एक बेजुबान जानवर को सिर्फ अपने स्वार्थ एवं चन्द पैसों के लिए जानवर मालिक और जानवर खरीदने वाले कितने निर्दयी होते थे, जो खेतों में कड़ी मेहनत करके उसके परिवार व सारे विश्व की मानव जाति के लिए जीवित रहने के लिए अनाज पैदा करता हो और अन्तिम समय में उसे थोड़े से स्वार्थ के लिए इतना धृणित कार्य करते थे। उस समय जो लोग यह कार्य करते थे मैंनेे उनकी जिन्दगी बहुत ही नजदीक से देखी है। उन सभी ने अपने अन्तिम समय में इतनी बीमारियों एवं कठिन से कठिन दर्द को झेलते हुए इस संसार से विदा हुए जिसका यहाॅ पर उदृदित नहीं किया जा सकता।

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