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बोर्ड परीक्षा - II


हाईस्कूल की दोबारा परीक्षा का सेन्टर लखनऊ हुसेनाबाद इण्टर कालेज में गया। अब लखनऊ में परीक्षा के दौरान रहने की काफी दिक्कत थी, इस बारे में मैंने अपने बड़े मामा जी से बताया तो उन्होंने कहा कि हमारे गांव के लाला सुशील का घर रकाबगंज में है, तुम्हें वहाॅ रहना हो तो हम तुम्हें परीक्षा देने हेतु एक कमरा दिला देगें। 
परीक्षा के 15 दिन पूर्व हम और मेरे मामा जी लखनऊ गये और लाला जी से रहने की बात की तो उन्होनें कहा ठीक है, एक कमरा बाहर का है, उसी में यह रूक जाये और अपनी परीक्षा दें। परीक्षा के समय हमारे साथ नरायनपुर गांव के गंगाराम ने भी फार्म भरा था, तो वह भी मेरे साथ परीक्षा देने के लिए रकाबगंज में ही आ गया और हम दोनों साथ ही परीक्षा दी। परीक्षा के दौरान ही गंगाराम को काॅवर( केवंरा/ज्वांडिस) हो गया और वह बहुत बीमार रहने लगा, काफी दवा कराने के बावजूद जुलाई माह में उसकी मृत्यु हो गयी।
 उसकी मृत्यु का समाचार जब मुझे मिला उस समय मैं अपने बाग में आम की रखवाली कर रहा था। उसे देखने के लिए जब मैं अपने गांव से चला तो हसनपुर व नरायनपुर के बीच एक बहुत बड़ा नाला पड़ता है, जिसमें उस समय पानी बहुत ही जोरो से बह रहता था, उसे पार कर उनके गांव जाना था। मैं तो किसी तरह तैर कर उस चला गया परन्तु हमारे ही मोहल्ले के मित्र सुरेश कुमार पुत्र श्री किशुन तैर ही रहे थे और तैरते ही तैरते अचानक वह बहने लगे, उन्हें पानी में बहते हुए देखकर मैं बहुत ही घबरा गया और चिल्लाने लगा तो पास ही कई लोग अपने जानवरों को चरा रहे थे, उन्होनें ही हमारे मित्र सुरेश को किसी तरह बचाया। 
हम दोनों लोग बहुत ही डरे हुए उनके घर पहंुचे और उनके अन्तिम संस्कार में शामिल हुए मैं उसे देखकर बहुत रोया क्योंकि इसके पहले भी हम दोनों लोग जनता हायर सेकेन्ड्री स्कूल, खड़ौहा में पढ़ते थे और हमारी उससे अच्छी दोस्ती थी काफी दिनों तक मैं उसकी याद में चिन्तित रहा। लगभग दो माह बाद हाईस्कूल का रिजल्ट आ गया और हम दोनों पास तृतीय श्रेणी में पास हो गये।
यहाॅ यह भी बताते चले कि जो हमारे मित्र उस समय नाले में डूबने से बच गये और सकुसल हमारें साथ वापस शाम को घर आ गये। अगले वर्ष 1987 में उनकी शादी हो गयी। शादी होने के बाद पत्नी व घरवालों से खास नहीं पटती थी और आय दिन झगड़ा होता रहता था, इन्हीं बातों को लेकर मेरे मित्र बहुत ही परेशान रहते थे और जब ज्यादा ही परेशान हो गये तो वेे अपनी पत्नी को लेकर कानपुर काम-धन्धे की तलाश में चले गये। 
वहाॅ पर लगभग एक वर्ष रहे और इसी बीच उनके एक पुत्र का जन्म भी हो गया और तीनों लोग आराम से जीवन-यापन कर रहे थे, कि अचानक एक दिन उनके पैर में लोहा लगने से चोट लग गयी और उस चोट को उन्होंने उस समय नजरंदाज कर दिया, परन्तु थोड़े ही दिन बाद उस चोट के कारण उन्हें टिटनिस की बीमारी हो गयी। उक्त बीमारी का इलाज उन्होंने कानपुर में अपनी सार्मथता के अनुसार काफी कराया, परन्तु उनका पैर वहाॅ पर ठीक नहीं हुआ और कुछ दिन बाद उन्हें लखनऊ मेडिकल कालेज में भर्ती कराया गया। यहाॅ पर भी काफी पैसा खर्चा हुआ परन्तु एक सप्ताह बाद ही उन्होंने अपनी लम्बी बीमारी से जूझते हुए दम तोड़ दिया। उनके मरने के कुछ दिन बाद ही उनकी पत्नी ने दूसरी शादी कर ली। इस तरह मेरे अजीत मि़त्र सुरेश कुमार अल्प आयु लगभग 26 वर्ष की उम्र में ही दुनिया को विदा कह गये और बस छोड़ गये तो सिर्फ अपनी यादें। 
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