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बोर्ड परीक्षा


जाडे़ का मौसम समाप्त होने वाला था और बसंत का मौसम आ गया फागुनी हवा चल रही थी, रंग-बिरंगी होली का त्योहार बीतने के बाद खेतों में चना, सरसो पकने लगे तथा गेहॅू की बालियाॅ भी पीली पड़ रहीं थी और वहीं रस भरे महुआ पेड़ों से गिर रहे थे, आम के बौर ऐसे खिल रहे थे, मानों आम के पेड़ों को सोने की चादर ओढ़ा दी गयी हो, चारो तरफ मौसम सुहावना हो रहा था, सुबह और शाम तरह-तरह की पक्षियों का कलरव खूब गूंज रहा था और गर्मियों के मौसम ने अपने आगमन की दस्तक दे दी थी।
  हाईस्कूल के बोर्ड की परीक्षाओं की तैयारी बड़े ही जोर-शोर से चल रही थी और घीरे-धीरे मार्च का महीना आ गया यानी बोर्ड परीक्षा की तिथियाॅ घोषित होनी वाली हैं। पूरे स्कूल में त्योहार जैसा माहौल हो रहा था, चारो तरफ बस यही चर्चा चल रही थी कि अबकी बार देखों हाईस्कूल का सेन्टर कहाॅ जाता है। इन्हीं चर्चाओं के माहौल में ही एक दिन बोर्ड परीक्षा की तिथि एवं सेन्टर के नाम की सूचना आ गयी। अगले दिन ही प्रार्थना स्थल पर प्रधानाचार्य महोदय ने हाईस्कूल के बच्चों को सूचना दे गयी कि आप सभी का बोर्ड का सेन्टर त्रिलोकी नाथ इण्टर कालेज, काकोरी, लखनऊ में गया हुआ है। यह भी बताते चले कि मेरे बड़े भाई साहब एवं श्री नारायण जो मुझसे कई क्लास आगे थे परन्तु इस वर्ष हम तीनों लोग बोर्ड की परीक्षा मंे एक साथ ही बैठ रहे थे।
उस समय बोर्ड परीक्षाएं मार्च में शुरू होती थी और मई माह तक चलती थी। परीक्षा की सूचना आने पर काफी उत्साह था, परन्तु विवश्ता भी यहाॅ मैं अपने जीवन की वह घटना का उल्लेख करनाा चाहता हॅू कि मेरे पास कपड़े बहुत ही कम थे, मात्र एक हाफ शर्ट और एक पायजामा था, और जो हाफ शर्ट था भी उसकी एक आस्तीन फटी हुई थी, अब परीक्षा देने कैसे जायेगें, उसी उधेड़बुन में मैं सोच-सोच कर बहुत ही परेशान हो रहा था कि अब कैसे काम चलेगा, उस समय कपड़े मांग कर पहनने का रिवाज था, परन्तु एक दो दिन की बात हो तो कोई कपड़े दे भी दे, परन्तु लगभग एक माह का समय लगना था, इस कारण कोई अपने कपड़े मांगने पर नहीं दे रहा था।
हार थक कर मैंने वही फटी शर्ट पहनने का इरादा किया। उस वक्त मेरे घर के सामने मेरी एक भाभी स्व0 रामलाल जी पत्नी जो रहीमाबाद में अपने मैके में कुर्ता कढ़ाई का काम करती थी। पता चला कि सिलाई भी अच्छी कर लेती है। मै उनके घर गया और कहा भाभी जी मेरे शर्ट की आस्तीन फट गयी है, उसे सिल दे तो उन्होंने मजाक में मेरी शर्ट की आस्तीन और फाड़ दी, कहा कि नया बनवाओ। इसे अब मत पहनो मैंने कहा कि मुझे कल परीक्षा देने जाना है, इसे सिल दो तो उन्होने मेरी मजबूरी समझी और उस शर्ट की आस्तीन ऐसी सिली की अच्छे-अच्छे दर्जी भी उनके आगे फेल हो जायेंगे।
वह शर्ट पहनने पर कहीं से पता नहीं चलता था कि यह आस्तीन हाथ से सिली हुई या मशीन से। मै उनका आज भी शुक्र गुजार हॅू कि एैन मौके पर मेरी फटी हुई शर्ट को सिलकर उन्होेनंे बहुत ही अच्छा कार्य किया, मैं उनका आजीवन आभारी रहूॅंगा और ईश्वर से प्रार्थना करता हॅॅूं कि उन्हें किसी प्रकार की कोई कमी न रहे। परन्तु ईश्वर को शायद उनका सीधापन मंजूर नहीं था और उनके पति की 50 वर्ष की उम्र में ही गुर्दे की लम्बी बीमारी के कारण मृत्यु हो गयी, जिसका मुझे भी बहुत गम और अफसोस है परन्तु ऊपर वाला बहुत ही बड़ा ही कारसाज है, होनी को कोई नहीं टाल सकता और जो नहीं होना था, वह हो गया और अपने पीछे अपनी पत्नी पर बहुत ही भारी जिम्मेदारी का बोझ डालकर चलेे गये, उनके द्वारा दी गयी जिम्मेदारियों को वे बड़ी ही सहजता से निभा रही हैं। उनके पति यानी मेरे बड़े भाई साहब की बस स्मृतियाॅं ही अब जीवन में शेष बची हुई है।
अब यहाॅ यह बताता चलॅू कि हम लोग काकोरी पहुंचे कैसे जो साइकिल मेरे घर में थी उसके टायर काफी जर्जर हो चुके थे। इसलिए उन टायरों में पुवाल की रस्सी बनाकर भर दिया और वही साइकिल लेकर काकोरी चले गये। उस वक्त हाईस्कूल मंें 13 पेपर होते थे और बोर्ड परीक्षा लगभग 45 दिन चलती थी। गांव से काकोरी सेन्टर लगभग 35 कि0मी0 की दूरी पर स्थित था सेन्टर तक रोज तो पेपर देने जाने में काफी कठिनाई होती क्योंकि उस वक्त साइकिल के अलावा और कोई साधन नहीं था परन्तु पेपर सुबह 7 बजे से होते थे इतनी जल्दी कैसे पहुचा जाय। यह सोच कर कि कहीं किसी गांव या काकोरी में कोई रहने का ठिकाना मिल जाये तो अच्छा होगा।
 इसमें हमारे चचेरे मामा जी जो शाहपुर गांव में रहते थे उनके फूफा जी काकोरी में रहते थे मामा जी ने कहा कि चलो हम रहने की व्यवस्था करा देते है और उन्होंने काकोरी आकर अपने फूफा हीरालाल जी से कहकर सेन्टर से आधा कि0मी0 की दूरी पर संत रविदास जी का मंदिर था उसी में कुछ कमरे बने हुए थे, उसी रहने के लिए उन्होने बात की और हम लोग परीक्षा से दो दिन पहले ही उस मंदिर मंें अपना सामान लेकर साइकिल से काकोरी आ गये और जब पहंुचे तो मेरे स्कूल के और बच्चे वहाॅ पर मिल गये, अपने साथियों को देख कर मैं बहुत खुश हुआ कि चलो अच्छा हुआ कि मेरे साथी भी मिल गये और मैं अब दुगने उत्साह के साथ परीक्षा दे पाऊॅगा। वहाॅ पर खुद लकड़ियों से खाना बनाना होता था और लैट्रिन बाथरूम वहाॅ नहीं था, तो सुबह 4 बजे उठकर दूर खेतों मंें जाना होता था और कई कठिनाइयाॅ थी पानी बगल के मकान से लाना पड़ता, नहाने मंदिर से दूर एक कि0मी0 तालाब में जाना पड़ता था।
परीक्षा के पहले ही दिन गणित का पेपर था, पेपर काफी कठिन था कुछ खास नहीं कर पाया, इस कारण स्कूल से जब बाहर निकला तो काफी दुखी था और निराश भी, इसी हड़बड़ी में मेरा पहले ही दिन प्रवेश पत्र कहीं गिर गया और मंदिर वापस आ गया, कपड़े आदि उतार कर रखा, तो पता चला कि मेरा प्रवेश पत्र नहीं है, तो मैं उसी समय बदहवास होकर पैदल ही भागते हुए स्कूल गया, वहाॅ पर एक लड़का, जो परीक्षा नहीं दे रहा था, ऐसे ही टहल रहा था, उसे मेरा प्रवेश पत्र स्कूल के बाहर पड़ा मिला हुआ था।
वह लड़का बेचारा स्कूल के बाहर ही बैठकर सभी लड़कों की फोेटो मिलान कर देख रहा था, उसी समय मैं पहुंच गया और वह लड़का भागते हुए मेरे पास आया और कहा कि आपका प्रवेश पत्र मुझे पड़ा मिला हुआ है और मैं आपका काफी देर से इन्तजार कर रहा था कि जिस किसी का हो, उसे प्रवेश पत्र मिल जाये नही ंतो कल परीक्षा कैसे देगा। मैं अपना प्रवेश-पत्र पाकर इतना खुश हुआ कि पेपर खराब होने का गम सब भूल गया और उस लड़के को धन्यवाद कहा, और कहा कि चलो तुम्हें जलेबी खिलाते हैं, परन्तु उसने मना कर दिया और कहा कि मुझे घर जाना है वैसे ही काफी देर हो गयी है और कभी खा लेंगे।
बोर्ड परीक्षा लगभग डेढ़ माह तक चली, सभी लोगों के पेपर समाप्त हो गये थे मेरे और मित्र रघुवीर प्रसाद का इतिहास का एक पेपर रह गया था, सो हम दोनों को दो दिन और वहाॅ पर रूकना पड़ा बाकी सभी लोग अपने-अपने घरो को चले गये। दो दिन बाद जब 10 बजे पेपर छूटा और कमरे पर आ गये।
मई का महीना था गर्मी जोरों पर थी परन्तु हम लोगों के पास न तो खाने के लिए कोई राशन बचा था और न ही ज्यादा पैसे जिससे खाना खाया जा सके। हम दोनों ने विचार किया चलो अभी 11 बजे हैं और घर निकल चलते हैं और साइकिल नहीं थी हम दोनों लोग पैदल ही काकोरी से दुर्गागंज चैराहा आ गये और बस पर बैठ लिये पैसा न होने के कारण बस वाले से काफी झगड़ा भी हुआ और उसने बीच रास्ते में ही हम दोनों को उतार दिया।
काफी इन्तजार करने के बाद एक और बस आ गयी जिससे हम लोग मलिहाबाद तक आये परन्तु पैसा न होने के कारण उसने भी मलिहाबाद में ही उतार दिया उस समय लगभग दिन के 1ः00 बजे हुए थे गर्मी काफी हो रही थी और लू भी चल रही थी ऊपर भूख भी काफी लग रही थी हम दोनों विचार किया चलो अब पैदल ही आगे का रास्ता तय करते हैं। मेरे मित्र रघुबीर प्रसाद सिर पर बक्सा लादे हुए थे और मै अपना झोला हाथ में और उनका झोला सिर पर रख कर दोनों लोग वहाॅ से धीरे-धीरे चलते हुए अपने स्कूल जनता हायर सेकेन्ड्री खड़ौहा पहुचं वहाॅ थोड़ी देर रूककर आराम किया फिर दोनों लोग चले तो इस बार बक्सा मैंने लादा और झोला रघुवीर प्रसाद मैंने जैसे ही सर पर बक्सा लादा वेसे ही उसमें खटर-पटर की आवाल आने लगी तो मैंने पूछा मित्र इसमें क्या है जो आवाज आ रही है तो उसने बताया कि गांव से आटे के पेड़ा लाये थे वहीं है मैंने कहा कि मारे भूख के जान निकल रही है और तुमने बताया नहीं कि इसमें पेड़ा है उसने कहा कि पेड़ा कड़े हैं खा नहीं पाओगे हमने कहा ठीक है, चलो गांव पास करके देखते हैं, गांव निकल जाने के बाद हम दोनों ने बक्शा खोल कर पेड़ा खाने के लिए निकले और उन्हें तोड़ने की कोशिश की परन्तु पेड़े इतने कड़े थे कि वह टूट ही नहीं रहे थे हमने उन्हें तोड़ने के लिए आम के पेड़ पर जोर से पटका परन्तु वे टूटे नहीं बल्कि कई पेड़े गायब हो गये। फिर हम लोग हताश होकर आगे चले तो खेतों के पास छोटी सी नाली बह रही थी हमने कहा चलो इन पेड़ों को पानी में भिगोते हैं और मुलायम होने पर खायेंगे जितना पानी में भिगेगे उतना ही दांतो से घिसकर खा जाते बड़ी मुश्किल से हम दोनों ने आधा-आधा पेड़ा खा पायें होंगे और बाकी बचे फेंक दिये। घर 4ः00 बजे पहंुचे तब जाकर मैने दो दिन बाद खाया और खाना खाते हुए ही मुझे इतना नशा चढ़ा मैं रात्रि 10 बजे तक सोता ही रहा।
गर्मियों में उस समय कृषि कार्य काफी काम होता था, जैसे गेहूॅू कि मड़ाई वह भी बैलांै द्वारा सुबह/शाम दो समय गेहूॅ की मड़ाई की जाती थी उसमें माता-पिता भाई बहन सभी लोग को मिलकर गेहॅू की मड़ाई में सहयोग करना होता था और आम की रखवाली बच्चों व बुजर्गो के हाथ होती थी क्योंकि किसान के घर में इतने काम होते थे कि घर के छोटे बड़े सभी लोगों को काम करना पड़ता था कोई खाली नहीं रहता था।
महिलाओं को तो डबल काम करना पड़ता था, पति के साथ सारा दिन खेतों में काम करना और शाम को घर आकर सारे काम के साथ-साथ चूल्हे पर लकड़ियों से खाना बनाना पड़ता था दोपहर को खाना बनाने के बाद फिर से पति के साथ काम पर जाना होता और रात तक कार्य करने के बाद फिर शाम का खाना बनाना होता था बहुत सारे छोटे-छोटे ऐसे कार्य होते थे कि उनका यहां पर बयां करना बहुत ही कठिन होगा, जैसे जानवरों को चारा खेते से लाना और घर पर हाथ से गड़ासे से काटना, कुआॅ से पानी भर कर सभी जानवरों को पिलाना यह सारा कार्य घर की महिलाओं व बच्चों को ही करना पड़ता था।
वर्ष 1983 माह जुलाई मंे हाई स्कूल बोर्ड परीक्षा का परिणाम निकला उसमें मैं गणित विषय में फेल हो गया और मेरी सेप्लीमेन्ट्री मतलब एक विषय में पुनः परीक्षा देनी होगी, तभी हाईस्कूल पास माना जायेगा। उक्त सेप्लीमेन्ट्री का फार्म अगस्त माह में भरा गया और माह सितम्बर में दोबारा परीक्षा देने हेतु काली चरण डिगी कालेज, लखनऊ में सेन्टर पड़ा। गांव से हम और हमारे बड़े भाई साहब दोनों लोग साइकिल से परीक्षा के एक दिन पूर्व लखनऊ आये और भाई साहब स्कूल से कहींे छोड़कर मुझे चले गये और कहा कि अभी आ रहा हॅू परन्तु काफी देर इन्तजार करने के बाद नहीं लौटे तो मैं अन्व्जान शहर में अकेला काफी परेशान हो गया और सोचने लगा कि मैं कहा जाऊ उस समय शहर में मेरी किसी जान-पहचान नहीं थी और न कोई रास्ता मालुम था  और न ही पास में पैसे थे अब मैं जाऊॅ तो कहाॅ जाऊॅ शाम हो गयी और गर्मी का महीना था करता न क्या करता सोच-समझकर कोनेश्वर मंदिर के पास आया वहाॅ पर कुछ परसाद बट रहा था वहीं परसाद खाया और सामने घण्टा घर की तरफ चला गया और वहीं घटाघर के तिराहे पर पूरी रात जमीन पर लेट कर काटी।
 सुबह फिर स्कूल गया तब देख हमारे भाई साहब वहाॅ पर खड़े थे और कहने लगे तुम कहाॅ चले गये थे हमने तुम्हें बहुत ढुढ़ा जब तुम नहीं मिले तो हम कनार गांव बुआ जी के यहाॅ चले गये थे और रात में वहीं रूके थे तुम्हारी बहुत चिन्ता हो रही थी मैंने रात ठीक से खाना नहीं खाया और न ही सोया और सुबह होते ही स्कूल की तरफ भागा चला आया तो मैने भी अपनी आप बीती सुनाई और मैं बहुत रोया। गर्मी की वजह से मेरा पेट खराब हो गया था फिर बाद में डायरिया भी हो गयी और मैं ठीक से परीक्षा नहीं दे पाया और पुनः गणित में फेल हो गया और इस तरह मेरा वर्ष मेरा खराब चला गया।
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