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गरीब की बद्दुआ


जाडे़ का मौसम समाप्त होने वाला था और बसन्त का मौसम आ गया, फागुनी हवा चल रही थी, रंग-बिरंगी होली का त्योहार बीतने के बाद खेतों में चना, सरसों पकने लगे तथा गेहॅू की बालियाॅ भी पीली पड़ रहीं थी और वहीं रस भरे महुआ पेड़ों से गिर रहे थे, आम के बौर ऐसे खिल रहे थे, मानों आम के पेड़ों को सोने की चादर ओढ़ा दी गयी हो, चारो तरफ मौसम सुहावना हो रहा था, सुबह और शाम पेड़ों पर बैठें तरह-तरह की पक्षियों का कलरव खूब गूंज रहा था और गर्मियों के मौसम ने अपने आगमन की सूचना दे रहा था।
  आज पूरे मोहल्ले में महिलाएं, बच्चे और पुरूष सब लोग लोग बहुत ही खुश दिख रहे हैं, माजरा क्या है कि सभी लोग इधर-उधर भाग-दौड़ कर रहे हे। मैं भी बड़ी उत्सुकता से सभी लोगों को कार्य करते हुए देख रहा था, कोई अपने घर से मिट्टी का तेल बोतल में भरे हुए चला आ रहा है, तो कोई सूखी लकड़ी जलाने के लिए सिर पर लादे हुए आ रहा है, आटा-दाल व आलू एव ंतेल मसाला आदि लेकर भागे चले आ रहे हैं। कुछ लोग एक तरफ खाने-पीने का इन्तजाम कर रहे थे, बड़े-बुजुर्ग इधर-उधर उछल-कूद कर रहे बच्चों को बार-बार डांट रहे हैं कि आप लोग ज्यादा शोर-शराबा न करें और दूर कहीं जाकर खेलंे।
थोड़ी दूर पर देखा कि कुछ लोग घेरा बनाये हुए खड़े हैं, पता चला कि वहाॅ पर रात की रोशनी के लिए एक पेट्रोमैक्स (गैस) जलाने का प्रयास किया जा रहा है। मैं भी अपनी दादी के पास बैठा हुआ यह सब नजारा देख रहा था और कौतूहल वश मैंने अपनी दादी से पूछा कि दादी आज कोई क्या त्योहार है या फिर किसी के यहाॅ शादी है? दादी ने बताया कि आज किसी के यहाॅ शादी नहीं है और न ही कोई त्योहार है, आज यहाॅ पर कठपुतली का नाच/नाटक दिखाया जायेगा, इसीलिए गांव के सब लोग उसी की तैयारी में लगे हुए हैं। क्या आज कठपुतली का नाच है, दादी ने कहा हाॅ भाई हाॅ।
यह जानकर की आज कठपुतली का नाच है, तो मैं बहुत खुश हुआ और उसी समय अन्य बच्चों के साथ उछलता-कूदता हुआ वहाॅ पर पहंुच गया, जहाॅ पर आज कठपुतली का नाच होना था। थोड़ी ही देर में कठपुतली दिखाने वाली मण्डली भी आ गयी। गांव वाले उनके बैठाने का इन्तजाम मेरे घर के सामने ही मनोहर के घर पर रखे छप्पर के नीचे किया हुआ था, इस कारण मुझे उनसे मिलने में कोई कठिनाई नहीं हुई। चूंकि घर के सामने होने के कारण वे छोटी-छोटी जरूरतों के सामान हमसे घर से लाने के लिए कहते और हम उन्हें सहर्ष ही सामान उठा-उठाकर देते और उनके साथ आये हुए परिवार के अन्य सदस्यों से बीच-बीच में बात भी करते जाते और कठपुतलियों के बारे में जल्दी से जल्दी सारी जानकारी पहले ही हासिल करना चाहते, कि इनको कैसे नचाते हो और यह कैसे अपना सर एवं पैर हिला-हिला कर नाचती हैं, उनके द्वारा गोल-मोल जवाब दिया जाता और कहते कि अभी सब जानकारी ले लोगे तो रात्रि में इनका नाच क्या देखोगे?
जाड़े के दिन थे, सूरज शाम को जल्दी से अस्त हो जाता है। इस कारण शाम 5 बजे ही रात मालूम होने लगती है। खैर कठपुतली नाच की सारी तैयारियां गांव वालों द्वारा शाम होने के पूर्व ही कर ली गयी है इसलिए नाच शुरू करने में अब कोई कठिनाई नहीं है। कठपुतली मालिक नाच वाले स्थल पर गया और कहा कि यदि इन्तजाम पूरा हो गया हो तो गांव के सभी लोगों को सूचित कर दो कि नाच प्रारम्भ होने जा रहा हैे।
नाच आरम्भ होने की खबर जैसे ही सभी के कानांे मंे पड़ी बच्चे शोर करते हुए टोली बनाकर पहंुचे और आगे बैठने की होड़ मचाने लगे और आपस मंे झगड़ा करने लगे, इस पर गांव के बड़े बुजुर्गों नंे सभी को शान्त कराते हुए डांटा और कहा कि कोई बच्चा शोर-शराबा नहीं मचायेगा, नही ंतो कान पकड़कर यहाॅ से निकाल देगें और फिर पीछे बैठना पड़ेगा। मैं भी अपने पिता जी व परिवार के अन्य सदस्यों के साथ कठपुतली का नाच देखने गया। कठपुतली दिखाने वाला अपने फन में इतना माहिर था कि कहानी के पात्रों को ऐसा घुमाता और उनकी आवाज में वेसे ही बोलता कि ऐसा लग रहा था कि यह काठ की न होकर असली मानव ही हों।
रात्रि 12 बजे तक नाच का प्रोग्राम चला और कठपुतली वाले ने कई कहानियों का मंचन किया, जैसे राजा हरिश्चन्द्र, सीता हरण, माखन चोर आदि का बखूबी मंचन कर सभी का मनोरंजन कर दिल जीत लिया, सभी गांव वालों ने जिसमें जो श्रद्धा थी, उसने उसको इनाम दिया और पूरी कठपुतली मण्डली भी काफी इनाम व अनाज पाकर खूब खुश हुए।
कठपुतली मण्डली के साथ और भी कई मण्डलियां थी, वह भी वहीं पर रूकी हुई थी। अगले दिन मेरे पिता जी से कठपुतली वाले ने कहा कि कहा चाचा जी यदि आपको कोई ऐतराज न हो तो हम लोग यहाॅ पर दो चार दिन और रूक जाये और आस-पास के गांवों में अपना खेल दिखाकर कुछ और आमदनी कर लेें। इस पर मेरे पिता जी ने कहा कि इसमें ऐतराज करने वाली कौन सी बात है आप लोग जब तक चाहें रूकंें परन्तु किसी प्रकार की कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए, तो उसने कहा नहीं चचा किसी प्रकार की कोई शिकायत नहीं होगी और आपके आदेशों का पालन होगा।
कठपुतली वाले अपने माता-पिता और बीबी-बच्चे को भी साथ लाये हुए थे, दिन में आदमी लोग दूसरे गांवों में गुलाबों-सीताबो का खेल दिखाने चले जाते और उनकी महिलाएं एवं बच्चे घर पर रह जाते थे। कठपुतली वाला अपने साथ कुछ बकरिया भी लाया था जिससे उसकी बूढ़ी माॅ जिसकी उम्र लगभग 80 वर्ष रही होगी, जिसे चलने-फिरने में काफी कठिनाई हो रही थी, वह अपनी उन बकरियों को लेकर पास के खेत में चराने लिए छोड़ दिया। बकरियों पास के खेतों में आराम से चर रही थी, उसी में से एक बकरी पास के आम का बाग में चली गयी और आम के पेड़ के नीचे गिरे हुए सूखे पत्तों को खाने लगी, इसी समय बाग के मालिक ठाकुर डा0 बाबू सिंह, जो हसनपुर गांव के ही रहने वाले थे, उसी समय वहाॅ पर आ गये और पास में खड़े कई चरवाहों से पूछा कि यह बकरी किसकी है, जो मेरे बाग में आम के पत्ते खा रही है, उसके कई बार पूछने पर किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया और उसकी बात का उत्तर न मिलने पर वह आग-बबूला हो गया है और तैस में आकर कहा कि जिसकी  बकरी हो, वह मेरे सामने आ जायेे।
 परन्तु उस समय गांव में ठाकुरों का बहुत दबदबा था और जिसे चाहते थे, उसे बात-बात में मार बैठते थे, उनकी हनक के आगे क्या मजाल है कि किसी की जबान खुले। कुछ देर बाद जब किसी ने यह नहीं बताया कि बकरी किसकी है, तो वह बहुत ही नाराज हुआ और खुद ही बाग में जाकर बकरी को पकड़कर पेड़ से बाधकर बकरी को डण्डों से मारने लगा।
बकरी के चिलाने पर पास में ही बैठी कुठपुतली वाले की माॅ से बकरी के चिल्लाने की आवास सुनकर रहा नहीं गया है और वह दौड़कर आयी और ठाकुर जी के पैर पकड़ कर रोने लगी कि साहब हमारी ही बकरी है, गलती से तुम्हारे बाग में चली गयी, उसके लिए हमें माफ कर दीजिए। यह सुनकर वह बौखला गया और आनन-फानन में बकरी को मारना छोड़कर उस बूढ़ी माॅ पर डण्डों से बड़ी तेजी से प्रहार करने लगा, मार पड़ने पर वह बहुत तेज चिल्लाती और पैर पकड़कर माफी मांगती, परन्तु ठाकुर जी पर इसका कोई असर नहीं हुआ, वह और तेजी से डण्डे और लातघूंसों से मारने लगे, उसको इतना मारा कि वह वही पर बेहोश होकर गिर गयी, तब जाकर उसने उसको छोड़ा और भद्दी गालियाॅ देते हुए कहा कि शाम फिर आयेंगे और तुम्हारे आदमियों से निपटेगें। घटना के समय पूरे मोहल्ले के पुरूष, महिलाएं, बच्चे सिर्फ तमाशबीन हुए खड़े रहे, किसी ने इतनी हिम्मत नहीं जुटाई कि उस बुजुर्ग महिला को उसके चंगुल से बचा सकें।
खैर उसके जाने के बाद पास मंें खड़े लोगों ने बेहोश पड़ी उस बूढ़ी माॅ को पानी डालकर होश में लाये। होश में आने पर उसने उस ठाकुर को भी खूब भद्दी-भद्दी गालियाॅ दी और कहराते हुए कहा कि ऊपर वाले से मेरी यही फरियाद है कि यह ठाकुर जहाॅ मरे वहाॅ पर इसे एक बूंद न मिले, यही कहते हुए वह फिर बेहोश हो गयी। शाम को उसके परिवार के लोग आये और पूरी घटना की जानकारी जब उन्हें हुई तो वह लोग अपनी माॅ की चोट देखकर काफी दुखी हुए और सहम गये। और वे सभी लोग भी उस ठाकुर को भला-बुरा कहते हुए कोसने लगे।
बेसहारा और गरीब की कौन सुनता है, उनमें उस ठाकुर से लड़ने की क्षमता कहाॅ थी। दूसरे ही दिन पूरी मण्डली अपने परिवार के साथ अन्य गांव के लिए पलायन कर गयी। उस समय मेरी उम्र लगभग 10 वर्ष की रही होगी, उनकी यह दशा देखकर मेरा मन बहुत ही दुखी हुआ और सोचा कि मानव समाज में भी मानव के साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया जाता है और जानवरों से बद्तर जीवन जीने के लिए यह सब मजबूर हैं।
कठपुतली मण्डली को अभी एक महीना भी नहीं बीता होगा कि सवेरे-सवेरे मैं सोकर उठा ही था कि ठाकुर साहब के घर से चीख-पुकार की आवाजें आ रही थी, पता चला कि आज रात में अज्ञात लोगों ने बाबू सिंह पर गोलियों से हमला कर दिया और वह घायलावस्था में नहर के किनारे बाग  में खून से लथ-पथ पड़े हुए हैं।
यह खबर गांव में जंगल में आग की तरह देखते ही देखते फैल गयी, उस समय ठाकुर जी का रास्ता मेरे ही मोहल्ले से होकर गुजरता था इसलिए उनके बीबी-बच्चे सभी लोग रोते-बिलखते मेरे घर के सामने से ही गुजर रहे थे। उन्हें रोता हुआ देखा तो मुझे उस दिन की याद ताजा हो गयी कि यही ठाकुर जी अपनी रौब में उस गरीब, असहाय, लाचार महिला की बेहरमी से पिटाई की थी और इनकी ही पिटाई से वह बेचारी रात भर दर्द से कहराती रही और अपनी पीड़ा को सहते हुए रात काटी। पीड़ा होने पर ठाकुर जी को बीच-बीच में बद्दुआएं रात भर देती रही।
तब मुझे ज्ञात हुआ कि गरीब की फरियाद का असर इतनी तेजी होता है और यही कहावत चरितार्थ हुई ऊपर वाले के घर देर पर अन्धेर नहीं। इस घटना से हमें यह सीख मिलती है कि हमेशा लाचार, वेबस, निर्धन व असहाय लोगों की मदद करनी चाहियें और बेवजह किसी को परेशान न करें, नहीं तो गरीब की बद्दुआ का असर तीर के समान जीवन पर पड़ता है, उस तीर से कोई तुम्हे बचा नहीं सकता।
                                                                                                                                 आगे पढ़ें ----------