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जीवन दान


वर्ष 1989 में दिसम्बर का महीना था जाड़ा खूब पड़ रहा था इस कारण मेरे सभी साथी व व बड़े भइया अपने-अपने गांव चले गये और मेरी कक्षा-11 की छमाही की परीक्षा होनी थी इस कारण मैं गांव नहीं जा सका। मेरे पास एक दिन दो दिन का ही राशन बचा हुआ था गांव जाते समय भइया ने कहा कि हम एक दो दिन बाद राशन लेकर लौट आयेगे,ं तब तक इसी से काम चलाओं।
इनके जाने के बाद मौसम बहुत ही खराब हो गया और यह लोग गांव से तीन-चार दिन तक नहीं आये अब मेरे पास खाने की समस्या आ गयी न तो राशन था और न ही पास में पैसे थे कि कुछ बाजार से ही खरीद कर खाया जाय और उस वक्त लखनऊ शहर में बहुत कम ही लोग मेरे परिचित थे जिनसे मैं कुछ राशन या पैसा उधार ले सकता। एक दो दिन तो बिना खाये किसी तरह चल गया परन्तु भूख के मारे न तो पढ़ाई में मन लगता और न ही रात को नींद आती थी।
मेरी बुआ के गांव के लोग मुसाहब गंज में रहते थे उनसे मैं कुछ पैसे उधार मांगने गया परन्तु उन्होंने भी असमर्थता जताते हुए कहा कि मेरे पास इस समय पैसे नहीं हैं, चलो मेरे एक मित्र रहते है उनसे तुम्हें एक रूपया दिलवा देते हैं परन्तु उसके पास भी पैसे कम थे तो उसने मुझे सिर्फ 50 पैसे ही उधार दिये और कहा इतने ही मेरे पास है। उन्हीं 50 पैसों को लेकर मैं परीक्षा देने के लिए सुबह घर से निकला और और चैक सब्जी मण्डी गया और वहाॅ से 50 पैसे की ढाई किलो शकरकन्द खरीदी और झोले में रखकर स्कूल चला गया मैनंे सोचा कि जब परीक्षा देकर घर लौटूगा तो उबाल कर खाऊॅंगा।
 परन्तु स्कूल पहंुचते ही मेरे दोस्त मिल गये और झोले में शकरकन्द देखकर बोले अच्छा शकरकन्द गांव से लाये हो और आव न देखा ताव झोले से शकरकन्द निकाल कर खाने लगे और मुझे एक भी शकरकन्द खाने को नहीं दी कहने लगे कि तुम तो गांव में रोज ही खाते हो, इस तरह मैं फिर भूखा ही रह गया और साइकिल से दोपहर को अपने घर वापस आ गया दिन तो किसी तरह कट गया और यह लोग गांव से उस दिन भी नहीं आये। रात कैसे कटेगी मैं बहुत परेशान हो गया और मेरे मन में बहुत बुरे ख्याल आने लगे सोचता था कि जाकर आत्म हत्या कर लू और फिर सोचता कि जीवन बहुत ही अमूल्य है और मेरे मरने के बाद मेरे घरवाले और मेरे माता-पिता रो रोकर वैसे ही मर जायेगे और बहुत ही बुरा हाल होगा।
 लेकिन रात में नींद न आने से सांेचते-सोंचते बहुत ही डिप्रेशन चला गया और बार-बार मरने का ही ख्याल मन आने लगता काफी सोचने के बाद अन्तिम यह निर्णय लिया कि आत्म हत्या ही कर लेनी चाहिये। लगभग 8ः बजे रात्रि में आत्महत्या की रणनीति बना ही रहा था कि इतने में ही मेरे दरवाजे पर मकान मालिक की लड़की ने आवाज दी की भइया दरवाजा खोलो उसकी आवाज सुनकर मैं बहुत ही डर गया और काफी देर बाद मैंने दरवाजा खोला तो उसने कहा कि क्या कर रहे थे बड़ी देर से मैं दरवाजा खटखटा रही हॅूं तो मैंने कहा कि हम सो गये थे उसने कहा कि मम्मी ने किराये कि पैसे मांगे है मुझे चक्की से आटा लाना है हमने कहा भइया गांव गये है जब आयेंगे तब पैसा मिलेगा और उस समय मेरा आत्मा हत्या करने का प्लान फेल हो गया और मैं एक दोस्त जो रिक्शा चलाता था उसी के पास चला गया उसने मुझे खाने के बारे में पूछा तो मैंने कहा मै खाना खाकर आया हॅू परन्तु वह मेरी आवाज से पहचान गया कि तुम खाना खा कर नहीं आये चलो तुम्हारे लिए हम जल्दी से खिचड़ी बना देते हैं और उसने उसी समय मेरे लिए खिचड़ी पकायी वह खिचड़ी खाकर मैं एकदम से बेहोस हो गया इस पर मेरा दोस्त बहुत डर गया थोड़ी देर में जब मुझे होश आया तो मैने उसको अपनी पूरी बात बतायी इस पर मेरे दोस्त ने हमें बहुत ही डाटा और कहा कभी भी ऐसे ख्याल मन भी नहीं लाना हीं तो हम तुम्हें गला दबाकर मार डालेंगे। आज मै जो जिन्दा हॅू तो उस मकान मालिक लड़की की वजह से या फिर अपने रिक्शा वाले दोस्त की वजह से हैं।
                                                                                                                         आगे पढ़ें -------