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जज साहब


मई का महीना था, गर्मी अपने चरम पर थी। प्रचण्ड गर्मी होने के कारण आफिस के अधिकारी/कर्मचारी सभी लोग पागल हुए जा रहे थे, ऊपर से आज चेयरमैन साहब आफिस का निरीक्षण करने आ रहेे हैं। उनके आने की तैयारी में सभी लोग बड़े जोर-शोर से लगे हुए थे, कोई अपनी सीट साफ कर रहा है, तो कोई अपनी अलमारी को झाड़ रहा है, अर्दली लोग अपनी-अपनी टोपी व साफा सिधार रहे थे, ऐसा लग रहा है कि चेयरमैन साहब पहली बार दफ्तर आ रहे हैं।
 जज साहब और सचिव महोदय भी अपनी-अपनी केबिन की साफ-सफाई अपनी ही देख-रेख में करा रहे, हर कोई चाह रहा है कि चेयरमैंन साहब उनकी तारीफ करें। कई अधिकारी कार्य की प्रगति रिर्पोट खूब बढ़ा-चढ़ाकर बना रहे हैं, कि चेयरमैंन साहब को किसी तरह से खुश किया जाय जिससे उनकी और तरक्की हो सके। आफिस में आज कोई बड़ा उत्सव जैसा माहौल दिख रहा है। मैं तो अभी इस आफिस में नया-नया आया था, इसलिए मुझे आफिस के तौर-तरीकों की अभी तक कोई खास जानकारी नहीं है, इस कारण मैं अपनी सीट पर शान्ति से बैठा यह सब देख रहा था।
जज साहब का चपरासी दौड़ता हुआ प्रशासनिक अधिकारी के कमरे में घुसा और प्रशासनिक अधिकारी महोदय के पास आया और कहने लगा कि जज साहब ने कहा कि मुझे एक रिट का जवाब लिखवाना है, इसलिए प्रशासनिक अधिकारी से कहो कि जल्दी से किसी एस0टी0 को उनके पास भेज दे। प्रशासनिक अधिकारी ने मुझे अपने पास बुलाया और कहा कि आपकोे जज साहस ने बुलाया है, मैंनेे कहा ठीक और मैंे अपनी शार्टहैण्ड की कापी और पेंसिल लेकर उनके कक्ष में दाखिल हुआ। मेरे दाखिल होते ही जज साहब ने पूछा कि आप एस0टी0 हैं, तो मैंने कहा नहीं सर हम तो एस0सी0 हैं। यह सुनते ही जज साहब ने कहा कि तुम जाओं और एस0टी0 को मेरे पास भेजो। जज साहब के कमरे से वापस आकर मैं अपनी सीट पर बैठ गया। थोड़ी ही देर में चपरासी फिर आया और प्रशासनिक अधिकारी महोदय से कहा कि आपको जज साहब बुला रहे हैं और वह इस समय काफी नाराज हैं।
जज साहब ने प्रशासनिक अधिकारी महोदय को डांटते हुए कहा कि हमने तुमसे एस0टी0 भेजने के लिए कहा था, परन्तु आपने मेरे पास एस0 सी0 को भेज दिया, आप नहीं जानते हो कि आज चेयरमैन साहब आ रहे हैं और कार्य की कितनी अधिकता है, इस तरह की लापरवाही क्षम्य नहीं होगी।
प्रशासनिक अधिकारी महोदय ने कहा कि सर जिसको मैंने आपके पास भेजा था वह एस0टी0 ही है, परन्तु उसने तो बताया कि हम एस0सी0 हैं। जज साहब ने कहा कि उसे मेरे पास बुलाओं उसने मुझसे झूठ क्यों बोला, इसकी उसको सजा जरूर मिलेगी। थोड़ी ही देर में चपरासी मेरे कमरे में आया और कहा कि सर आपको जज साहब अपने कक्ष में बुला रहे हैं।
मैं फिर कापी, पेंशन लेकर उनके कमरे में दाखिल हुआ, जैसे ही उनके कमरे में मैं दाखिल हुआ, वह मुझ पर बहुत ही तैस में आकर भड़क कर बोले कि तुमने हमसे झूठ क्यों बोला। सर हमने कोई झूठ नहीं बोला, हमने तुमसे पूछा कि तुम एस0टी0 हो, तो तुमने एस0सी0 क्यों बताया, हमने कहा कि सर हम अनुसूचित जाति के हैं इसलिए आपके एस0टी0 कहने पर हमने अपने को एस0सी0 बताया, इस पर जज साहब ने कहा कि एस0टी0 का मतलब स्टेनो होता, अच्छा सर हमने समझा कि आप हमारी जाति पूछ रहें हैं, इसलिए हमने अपने को एस0टी0 की जगह एस0सी0 बताया। जज साहब ने कहा हमने समझा कि तुम सीनियर क्लर्क हो इसलिए हमने तुम्हें वापस जाने को कहा।
जज साहब ने समझाते हुए कहा कि यह आफिस है, कोई किसी का घर नहीं, यहाॅ पर जाति पूछकर काम नहीं दिया जाता। यह गलतफहमी समझ कर जज साहब और प्रशासनिक अधिकारी दोनों लोग हमारी समझ पर बहुत हंसे और कहा कि जाओ कापी पेंसिल लेकर आओ डिक्टेंशन लिखाना, क्योंकि चेयनमैंन साहब को आज ही जवाब जाना है।  यह थी हमारी नौकरी की बड़ी ही रोचक घटना और हमें इस घटना से यही सीख मिलती है कि बिना सोचे-समझे किसी बात का निष्कर्ष जल्दी नहीं निकालना चाहिए। अन्यथा गलतफहमी की वजह से कभी बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है।
 लगभग मैंने वहाॅ पर डेढ़ वर्ष पढ़ाया इसी बीच 02 मई,1995 को कानूनी सहायता परामर्श बोर्ड, जवाहर भवन, लखनऊ में मेरी स्टेनोग्राफर के पद पर नौकरी लग गयी। नौकरी लगने के बाद हम लगभग एक वर्ष तक वहाॅ और पढ़ाया, परन्तु सुबह जल्दी उठना और बिना खाये पढ़ाने जाना और वहीं आफिस चले जाना, इस कारण बहुत ही कठिनाई होने लगी। अतः मैंने शार्टहैण्ड का स्कूल बन्द कर दिया और घर पर ही सुबह कई लोगों को निःशुल्क पढ़ाने लगा।
इसी वर्ष सितम्बर माह में मेरी शादी राजाजीपुरम् से तय हो गयी और माह अक्टूबर में मेरी बरीछा और गोद भराई हो गयी, परन्तु लड़की के पिता ने मेरे पिता जी को देहाती कहा और कहा कि यह लोग बीड़ी, तम्बाकू बहुत पीते हैं। यह बात मेरे पिता जी ने हमें बतायी, हमें इस इस पर बहुत ही गुस्सा आया और हमने कहा कि जहाॅ हमारे पिता जी की इज्जत/सम्मान नहीं है, वहाॅ पर हम रिस्ता नहीं करेगें।
दो तीन दिन बाद मैंने लड़की के पिता से मिला और इस बारे में बात की तो उसने अपनी बात से मुकर गया और कहा कि हमने ऐसी कोई बात नहीं कही है, हमने कहा कि क्या हमारे पिता जी यह बातें झूठ बोल रहे है और हम आपके यहाॅ रिस्ता नहीं करेगंे। इसी बात को लेकर काफी कहा सुनी हुई और हमारा रिस्ता वहाॅ से टूट गया और एक सत्पाह के अन्दर ही हमारा उनका हिसाब हो गया। उनके यहाॅ से रिस्ता टूटने से उनके रिस्तेदार हमें तरह-तरह की धमकियाॅ दे रहे थे और कह रहे थे जहाॅ कहीं रहोगे या अन्य जगह से तुम्हें शादी नहीं करने देंगे। इस बात को लेकर हम काफी डर गये क्योंकि उनके रिस्तेदार सरकार में राज्यमंत्री थे।
ई-ब्लाक एफ-3739 वाला मकान हमने छोड़ दिया और नवम्बर, 1995 में एल0डी0ए0 टिकैतराय तालाब, लखनऊ मंे श्री सीताराम जी के मकान में 800 रू0 प्रतिमाह की दर से दो कमरे का मकान किराये पर लिया और वहीं सब लोग रहने लगे।
वर्ष 1996 में अप्रैल माह मंें मेरी शादी मेरे ही आफिस के लोगों ने सीतापुर से तय करा दी और हम लोग लगभग 10-12 लोग देेेेेखने के लिए गये, परन्तु वहाॅ पर गोद भराई का सारा इन्तजाम था। वहाॅ जाकर हम लोगोें ने लड़की देखी, लड़़की ठीक थी, पूरी बात तय हो गयी, कुछ देर बाद मैं बाहर टहलने के लिए निकला, तो छत पर वहीं लड़की और उसकी एक सहेली खड़ी थी उन्हीं दोनों लड़कियों द्वारा पान मशाला खाकर उसका कागज नीचे फेका जो मेरे ऊपर ही गिरा, यह देखकर मैं एकदम सन्न रह गया और मुझे बहुत हैरानी भी हुई कि क्या ऐसी पढ़ी लिखी लड़कियाॅ पान मशाला खाती होगीं।
यह सब देखकर मेरा मन उसी समय खराब हो गया और शादी न करने का फैसला लिया। कुछ देर बाद फिर सभी लोग इक्ट्ठा हुए और आगे की रणनीति तय होनी लगी इस बारे में मुझसे पूछा गया तो मैंने शादी करने से इन्कार कर दिया और मेरे इस फैसले से हमारे पिता जी चाचा जी और मेरे अन्य रिस्तेदार तथा साथी एकदम से सन्न रहे गये कि अभी तक तो सब ठीक था अब क्या हो गया, इस पर काफी लोग नाराज भी हो गये। हमने कहा कि हम सोच कर बताते हैं इस पर सब लोगों का कब सोच कर बताओगे हमने कही कि अभी बतायेगे। कुछ क्षण रूकने के बाद मैंने पिता जी और चाचा जी को बाहर ले गया और छत वाली घटना से उन्हे बतायी तो उन्होने भी कहा कि यह आदत ठीक नहीं है यदि ऐसा है तो तुम शादी मत करों और आज टाल देते हैं फिर एक दो दिन में शादी न करने की खबर भिजवा देेगे। इस तरह यह भी शादी होने से पहले ही टूट गयी।
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