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लखनऊ में प्रवेश


चूंकि बडे़ भइया पहले से ही अग्रसेन इण्टर कालेज, चैक, लखनऊ में पढ़ते थे और गांव के ही पण्डित जी जो कल्याण गिरि मंदिर के सामने होटल चलाते थे और एक प्राइवेट मकान में फ्री रहते थे। उन्हीं के साथ गांव के कुछ जो देहाड़ी मजदूरी व रिक्शा चलाने का कार्य करते थे, वह लोग भी वहीं पण्डित जी के यहाॅ रहते थे, वही पर बड़े भइया भी रहते और वहीं से स्कूल जाते थे, उन्होने किसी तरह एक वर्ष वहाॅ पर बिताया।
 वर्ष 1986 में मैं हाईस्कूल उत्तीर्ण हुआ और गांव के आस-पास उच्च शिक्षा का अभाव होने के कारण हमें आगे की पढ़ाई करने के लिए लखनऊ आना पड़ा। लखनऊ तो मैं आ गया, परन्तु मेरा मन अभी तक अपने गांव में ही बसा हुआ था, मुझे अपने गांव की बहुत याद आती कि कांश गांव में गर्मियों क्या वे दिन थे नहर, तालाब में उछल-कूदकर खूब नहाना और पेड़ों पर चढ़कर खेलना-कूदना तथा गांव के मित्र मण्डली के साथ तरह-तरह के अन्य खेल खेलना, गांव की शादियों में नाच-नौटकी दूर-दूर तक देखने जाना एवं तालाब से मछली पकड़ना।
जाड़े के समय में स्कूल से लौटते वक्त वह रास्ते के झलबेरी के बेर खाना, शाम को जाडे़ के समय अपने छोटे भाई बहनों के साथ घर मंे पड़े धान के पुवाल पर धमा चकौड़ी करना और बात-बात में लड़ाई-झगड़ा करना, माता जी, चाची जी व दादी का उस झगड़े का निपटारा करना व उनका खूब डांटना और माॅ के हाथों की बनी चूल्हें पर की गरम-गरम रोटियाॅ और छोटे भाई बहनों तथा परिवार का प्यार यह सब छूट गया।
लखनऊ आकर यह सब याद करके मैं बहुत ही दुखी होता और यही सोचता कि इतनी दूर हम बेकार ही पढ़ने आ गये। यहाॅ का माहौल और यहाॅ की संस्कृति सब देखकर मुझे अपने गांव के जीवन में जमीन आसमान का अन्तर का एहसास हुआ, क्योंकि यहाॅ पर कोई किसी से कुछ मतलब नहीं रखता था और सब अपने काम से काम रखते थे, यह देखकर मुझे बहुत ही अजीब और अपने को असहज महसूस करता और अतीत की यादें याद करके मन बहुत दुखी होता और मन यही करता कि अपने गांव लौट जायें।
लेकिन कुछ दिन यहाॅ रहने के बाद, यहाॅ का माहौल देखा कि यदि यहाॅ रहे, तो पढ़ाई नहीं हो पायेगी, क्योंकि दिन भर होटल पर बैठना होता था और रात मंे उन्हीं के साथ छप्पर के नीचे रिक्शा चालकों के बीच ही खाना-सोना होता था। अब ऐसे माहौल में पढ़ाई कैसे होगी, मैं भी कुछ दिन वहाॅ पर रूका, परन्तु मेरा मन वहाॅ नहीं लगता था और मैं कहीं कमरा लेकर उनसे अलग रहना चाहता था कि क्योंकि मजदूर लोग शाम को शराब, गांजा पीकर आपस मंे अक्सर मार-पीट व झगड़ा करते थे, जिससे वहाॅ पर रहना और मुश्किल था। परन्तु जैसे-तैसे एक वर्ष वहाॅ पर गंुजारा और दूसरे वर्ष मैंने वहाॅ की परेशानी घर में बतायी और कहा कि ऐसे माहौल में पढ़ाई नहीं हो पायेगी, कहीं अलग कमरा हम लोगों के लिए दिला दिया जाय, तो पिता जी ने कहा कि अलग कमरा लेने में काफी खर्च आयेगा और तुम लोग घर की हालत तो जानते ही हो।
अगले वर्ष कुछ दिन रहे परन्तु मेरा मन वहाॅ नहीं लगता था फिर मैंने इधर-उधर कोशिश करने के बाद झड़ियन तालाब स्थित पालद्वार में 45 रू0 प्रतिमाह में एक कमरा किराये पर लिया और उस कमरे में मेरे मित्र रामविलास, मंजनू जो सब्जी बेेचने का काम करते थे, रामऔतार, दीनमोहम्म्द ये दोेेनों रिक्शा चलाने का कार्य करते थे और नन्दलाल, रमेश, श्रीपाल व ज्ञान प्रकाश हम चार लोग पढ़ने वाले छात्र कुल-आठ लोग उस कमरे में रहने लग,े किसी तरह एक वर्ष यहाॅ पर बीता क्योंकि यहाॅ पर भी पढ़ने का माहौल नहीं बन पा रहा था और बिना बिजली, पानी व लैट्रिन के काफी दिक्कत होती थी।
एक दिन वहीं पालद्वारा कमरे के सामने धूप में बैठा था तो देखा कि गांव के ही उमाशंकर व श्रीनरायण, जो उस समय कहीं पर मजदूरी करके उसी रास्ते से लौट रहे थे, यह लोग मुझे दिख गये तो इनको मैंने अपने कमरे में बुलाया और कहा कि हम यही रहते है, तुम लोग कहाॅ रहते हो तो इन्होंने बताया कि हम वहीं ठाकुरगंज पण्डित जी के यहाॅ रहते हैं, तो हमने कहा कि आप लोग भी हमारे यहाॅ रहो तो उमाशकर ने मना कर दिया, परन्तु श्रीनरायण को हमने रोक लिया और कहा कि मजदूरी ही करने जाते तो हो यही से चले जाया करो। उस दिन से यह भी हमारे साथ रहने लगे और अगले वर्ष 1987 की हाईस्कूल की परीक्षा के लिए मैंने इनका भी प्राइवेट फार्म भरवाया और इसने भी मेरे साथ रहकर ही हाईस्कूल की परीक्षा वर्ष 1988 में पास कर ली।
इसी वर्ष माह अगस्त,1988 में सुरेश कुमार, सुभाष, श्रीनारायण और हम दोनों भाइयों ने मिलकर 50 रू0 पर एक खपरैल श्री सुन्दर लाल टेलर के यहाॅ पर लिया और उसमें एक वर्ष तक रहने के उपरान्त 1989 में वहाॅ से छोड़कर लोधपुरवा में श्री पुत्तीलाल लोध के यहाॅ 100 रूपये प्रतिमाह की दर से एक कमरा लिया गया और उसी में सुरेश कुमार, सुभाष, श्रीनारायण रामस्वरूप, बेचालाल, हम सभी लोग रहने लगे। यहाॅ पर भी बिजली नहीं थी, दीपक की रोशनी में पढ़ाई करनी होती थी और कुॅआ से पानी लाना होता था यह समझों की गांव और शहर में कोई अन्तर नहीं था एकदम गांव जैसा ही माहौल और गांव जैसी ही सुविधा थी।
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