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मेरे पिता जी


माता-पिता का कर्ज दुनिया में सभी कर्जों से बहुत बड़ा होता है, जिसे किसी भी कीमत से चुकाया नहीं जा सकता। माता जितना प्यार करती है, पिता भी उतना ही प्यार करते हैं, माता-पिता के प्यार का कोई मोल नहीं है। पिता जी हमेशा चाहते हैं कि उनका बच्चा किसी गलत रास्ते पर न जाय और हमेशा जिम्मेदारियों को समझे। पिता जी हमें अच्छे से अच्छे स्कूल में भेजते हैं, पैसे कम होते हुए भी हमारे लिये, पूरे पैसों का इन्तजाम कर देते हैं। पिता जी हमें बचपन में अपनी पीठ पर बिठा कर घुमाते थे, घोड़ा बनकर इधर-उधर घुमाते थे, और बड़े होकर अपनी सारी धन सम्पत्ति हमें दे देते हैं, ताकि हम खुश रहें।
धरती पर भगवान के रूप में मेरे माता-पिता ही हैं, जो मुझे प्यार करते हैं और मेरे साथ हमेशा मेरी परेशानियों को हल करने में सहायता देते हैं। जीवन में पिता होना बहुत जरूरी होता, बिना पिता के जीवन मानों बिना छत के घर, बिना आसमान के जमीन होना है। पिता का जीवन में बहुत बड़ा भाग होता है, जिसका वर्णन करना बहुत ही मुश्किल है, पिता न होते तो घर नहीं चलता, बिना पिता के दुनिया कभी नहीं अपनाती। जिसके पास पिता होते हें उसके पास दुनिया की सबसे बड़ी ताकत होती है, पिता से नाम और पहचान है, माता-पिता एक वो अनमोल रत्न हैं जिनके आशीर्वाद से दुनिया की सबसे बड़ी कामयाबी हासिल की जा सकती है, पता नहीं क्यों हमें हमारे पिता इतना प्यार करते हैं, कि दुनियां के बैंक खाली हो जाते हैं मगर पिता की जेब हमेशा हमारे लिए भरी रहती है, पता नहीं जरूरत के समय न होते हुए भी कहाॅ से पैसे आ जाते हैं, भगवान के रूप में माता-पिता हमें एक सौगात हैं जिनकी हमें सेवा करनी चाहिए और कभी उनका दिल नहीं दुखाना चाहिए, माता-पिता को हमेशा ही खुशी देनी चाहिए उनसे ही दुनिया है और उन्हीं के दम पर दुनिया में आपका अस्तित्व है।
मार्च का महीना था, जाड़ा समाप्ति पर था और गर्मी ने अपनी दस्तक दे दी थी, चारों तरफ नई फसल के पकने का मौसम आ गया। कुछ फसलें जैसे मसूर, चना, सरसों की कटाई भी चालू हो चुकी थी। घर के सदस्य खेती-किसानी के काम में सभी लोग काफी व्यस्त हो गये, जिस कारण जानवरों को चराने का कार्य छोटे बच्चों पर आ गया।
मैं भी इस वर्ष 1980 में कक्षा-सात की वार्षिक परीक्षा मंे बैठ रहा था और परीक्षा की शुरूआत हो चुकी थी, इसी बीच जानवर चराते समय मेरे पैर में चोट लग गयी और मैं अचनाकर गिर पड़ा जिससे मेरा एक पैर मुड़ गया और उसमें अन्दरूनी काफी चोट आयी जिस कारण चलने-फिरने में काफी कठिनाई हो रही थी। दूसरे दिन गणित का पेपर था, अब कल पेपर देने केैसे जायेंगेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेे, यही सोचकर मैं बहुत परेशान होने लगा, इस पर पिता जी ने कहा कि तुम परेशान न हो, कल हमें तुम्हें साइकिल से स्कूल छोड़ जायेंगे। परन्तु  मेरे घर की साइकिल खराब थी, पूरे गांव में साइकिल ढूढ़ने पर भी नहीं मिली और परीक्षा तो देनी ही थी, अब स्कूल कैसे जाया जाये क्योंकि पैदल तो चल नहीं सकते थे। जब गांव में किसी की साइकिल नहीं मिली तो पिता जी ने कहा चलो, हम तुम्हें कन्धे पर बैठाकर स्कूल ले चलते हैं। जबकि घर से स्कूल की दूरी लगभग-14-15 कि0मी0. की है इतनी दूर कन्धे पर बैठाकर कैसे चलोगे, तो उन्होंने कहा कि धीरे-धीरे सहिताते-सहिताते निकल चलेगें।
प्रातः सुबह 4 बजे ही पिताजी उठ गये और हमें अपने कन्धे पर बैठाकर परीक्षा दिलाने के लिए स्कूल के लिए निकल पड़े। उस समय परीक्षाएं प्रातः 7 बजे से होेती थी पिता जी ने हमें 6.30 पर ही स्कूल पहंुंचा दिया और 3 धण्टे परीक्षा के दौरान वहीं पर स्कूल के बारह पेड़ के नीचे भूखें प्यासे बैठे रहे। परीक्षा समाप्त होने के बाद हमे फिर कन्धें पर ही बैठाकर ही स्कूल से चले और रास्ते में फत्तेपुर गांव की दुकान से 10 पैसे के बतासे लिये और हम दोनों लोग बतासे खाकर नहर में पानी पिया और मुझे दोपहर को घर वापस लेकर आ गये। यह एक दिन की बात नहीं थी पिता जी ने हमें तीन दिन लगतार स्कूल अपने कन्धें पर ही बैठाकर परीक्षा दिलाने गये। आज भी वह अतीत के दिन जब मुझे याद आते हैं तो मेरा मन भर आता है और मुझे बहुत ही दुख होता है, कि कांश मेरे पिताजी जैसे हर बच्चे के पिता हांे, जो बच्चों के लिए कितना त्याग करते थे कि इनके इस महान आशीर्वाद के ही कारण आज हम लोग आलीशान मकान व लग्जरी गाड़ियों में घूमते हैं। यदि मेरे पिता जी ने आज अपना पूरा जीवन हम लोगों के लिए न्योछावर न किया होता तो मैं भी गांव में ही अन्य लोगों की तरह खेती-बाड़ी का ही काम देख रहा होता। मैं उनका आजीवन ़ऋणी रहॅूंगा।
गेंहॅू की बुवाई के समय क्वार के महीने में छोटे बच्चे जो 8-10 वर्ष के होेते थे वह खेतों में सूखी घास बीनने व ढेला फोंड़ने का कार्य करते थे। मैं भी अन्य बच्चों के साथ अपने खेत व अन्य लोगों के खेतों में मजदूरी पर घास बीनने जाते थे, उस समय घास बीनने के दोपहर तक 50 पैसे या 75 पैसे ही मजदूरी मिलती थी उसी पैसे से हम छोटे-मोट अपने खर्चे चलाते थे।
यदि अषाढ़ महीने के शुरूआत में बरसात कम हुई तो खरीफ की फसल की बुवाई समय से नहीं हो पाती थी जिस कारण खरीफ की फसल कम होने के कारण घर का सारा भोजन व अन्य खर्च सिर्फ धान की फसल पर ही निर्भर करता, जाड़े के महीनों में सभी के घरों में अनाज की कमी हो जाती थी, उस समय अक्सर शाम व दोेपहर को केवल नमक डालकर भात/चावल बनता था, वहीं हम लोग खाते थे। कभी-कभी अनाज की इतनी कमी आ जाती थी कि दोपहर का भोजन बनता ही नहीं था, हम लोग जब स्कूल से पढ़कर शाम को घर लौटते और घर पहंुचते ही चूल्हा देखते थे कि यदि चूल्हे में राख पड़ी होगी तो दोपहर का भोजन बना होगा, तभी हम लोगों के लिर रखा गया होगा यदि राख नहीं दिखती थी तो हम समझ जाते थे कि आज दोपहर का खाना नहीं बना है और हम लोग भूखे ही खेतों की तरफ चले जाते थे और वहाॅ पर चने का साग या बेर अथवा गन्ना चूस कर भूख मिटाते।
 कक्षा आठ की पढ़ाई हमारी बहुत ही कठिनाइयों में हुई उस समय को सोच कर बहुत ही दुख होता था कि हमारे माता-पिता और घर के अन्य सदस्य हम लोगों की परवरिश किन कठिनाइयों में की होगी, शायदा उसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। मेरे माता पिता व चाचा-चाची तथा दादी सब मिल कर हम लोगों को पढ़ाने का कार्य कर रहे थे। मुझे बहुत ही अफसोस है कि मेरी दादी हम लोगों के कमाने के पहले ही मार्च, 1987 में हमें छोड़कर संसार से विदा हो गयी। उसके दो माह पूर्व मेरी बहन की शादी तय हो चुकी थी और बरीछा गोदभराई हो गयी थी, परन्तु मेरी बहन की शादी मेरी दादी के सामने नहीं हो पायी, जिसका हमें काफी दुख है क्योंकि मेरी दादी की बड़ी इच्छा थी कि उनके सामने हमारे पोते-पोतियों की शादी हो जाये शायद ईश्वर को मंजूर नहीं था कि उनकी यह इच्छा पूरी हो, और उनके मरने के बाद ही मेरी बहन की शादी 15 मई, 1987 में हो गयी। जिस समय मेरी दादी की मृत्यु हुई उस समय हम लोेग लखनऊ में पढ़ रहे थे साधन/दूरसंचार का अभाव होने के कारण उनके मरने की खबर हम लोागों को नहीं मिली इस कारण हम और हमारे बडे़ भाई दोनों लोग उनके अन्तिम दर्शन नहीं कर पाये थे जिसका मुझे आज भी काफी गम एवं पश्चाताप है।
वर्ष 1980-81 मंें इस नये स्कूल में गया यहाॅ भी छुआ-छूत हावी थी सवर्ण घरों के लड़के लड़किया हम लोगों से बात नहीं करते थे और हमारी लोगों की अलग से लाइन लगती थी। कक्षा-8 में स्काउट गाइट के कैम्प लगे हुए थे और वहीं रात में स्कूल में ही रूकते थे, तो खाने आदि की काफी कठिनाई होती थी हमारे साथी गुरू प्रसाद मौर्य व रामपाल मौर्य साथ में पढ़ते थ,े यही दोनों लोग मेरा आटा-दाल व सब्जी ले लेते थे और अपना व मेरा भी खाना बनाते थे तथा दूर से मेरी थाली में डाल देते थे।
दोपहर में जब हमें नहाना होता था तो यही लोग कुआॅ से मेरे लिए पानी भी भरते थे और मेरे ऊपर पानी डालते थे, जब कभी इनको हमें इन्हें परेशान करना होता था तो मैं बालों में साबुन लगाकार खूब झाग बनाते हुए बैठ जाता और बार-बार पानी ऊपर डलवाते जिससे यह लोग परेशान हो किसी लड़के ने हमारी इस शरारत को इन्हें बता दिया और यह जानकर कि हमें जान-बूझकर यह परेशान करता हैं। यह जानकर एक दिन यह दोनों बाल्टी डालकर भाग खड़े हुए और कहा खुद ही पानी भरो और नहाओं हम अब नहीें भरेंगे और न ही छुआछूत मनायेंगे। यहाॅ पर कक्षा-8 की घटना का कुछ अंश प्रस्तुत हैं--
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