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मेरी माता जी



माॅ को नकारा नहीं जा सकता। नारी वह है जो निर्माण करती है, सृष्टि का पोषण करती है, संरक्षण करती है, पुष्पित-पल्लवित करती है। नारी जाति के बिना पुरूष का, इस विश्व का अस्तित्व सम्भव नहीं है। नारी हर रूप में पूजनीय है। जब एक नारी माॅ बनती है तो उसके ऊपर बहुत अधिक जिम्मेदारी आ जाती है। माॅ वह है जो अपने बच्चे को हर तरह से, हर दृष्टि से सुरक्षित, संरक्षित करती है और गर्भ से लेकर जब तक बच्चे माॅ की बात सुने, तब तक वह केवल उचित संस्कार और उचित शिक्षा ही प्रदान करती है। 

माॅ के द्वारा प्रदान संस्कार व्यक्ति के मानस पटल पर आजीवन रहते हैं। हमारा इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है जिसमें बचपन में जिन महापुरूषों ने अपनी माॅ से वीर रस की कविताएं, कहानी सुनी और देश के लिए अपनी जान गवां दी। एक माॅ अपने बच्चे को हर प्रकार से समाज उपयोगी, मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण इंसान बनाना चाहती है। इसलिए वह अपने पूरे तन, मन, धन से इस बात का प्रयास करती है कि उसका बच्चा एक अच्छा सभ्य नागरिक बन सके एवं मानवता के लिए, समाज के लिए, देश के लिए वह कुछ भी करने के लिए सदैव तत्पर रहे।
  चाहे गर्मी हो, बरसात हो या फिर जाड़े का समय हो, माता जी को किसी मौसम से कोई लेना-देना नहीं होता था, बस वह अपने समय की बहुत ही पाबन्द जितने बजे उन्हें सुबह उठना है और दैनिक कार्यों को करना है, उन पर मौसम का कोई असर नहीं दिखता, चाहे जितनी कठिनाई हो, वे अपना काम समय से करती और साथ-साथ परिवार के अन्य सदस्यों को अपने कामों के प्रति हमेशा सजग रहने के लिए प्रेेरित करती रहती थी। 
जब हम कक्षा आठ की पढ़ाई करते थे, उस समय गांव में बिजली नहीं थी और बिजली के सम्बन्ध में हम लोगों को कोई जानकारी भी नहीं थी कि बिजली क्या होती है। उस समय महीने में एक दो बार सरकारी कोटे पर 01 या 02 लीटर ही मिट्टी का तेल मिलता था, जिससे खाना बनाते समय या अन्य घरेलू कार्यो के लिए दीपक जलाकर उसकी रोशनी में कार्य किया जाता था। मेरी माता जी भी एक ही दीपक जलाती थी और वह खाना बनाते समय उसी दीपक की रोशनी में हम लोगों को पढ़ाई करने के लिए बैठाती थी और उसी रोशनी में खाना बनाने व पढ़ाई दोनों कार्य साथ-साथ हो जाते थे और आर्थिक बचत भी होती थी। 
उस समय गांव में ठाकुर राजाराम सिंह की एक ही आटा चक्की लगी थी और वहाॅ पर छोटी जाति वालों का अनाज नहीं पीसते थे, इस कारण गांव से दूर बयारी गांव, बछौली व रामपुर में लगी चक्क्यिों पर सर पर गेंहॅंू लाद कर पिसाने जाना होता था, परन्तु पैसों के अभाव के कारण अधिकांश घरों में लगी चकियों से आटा तैयार किया जाता और धान की कुटाई लकड़ी के मूसल द्वारा घर पर ही प्रातः चार बजे उठकर माता जी व चाची द्वारा किया जाता था, उसी समय हम सभी को पढ़ने के लिए जगा दिया जाता था और उसी दीपक की रोशनी में हम लोगों को पढ़ाई के लिए बैठाया जाता था, इस तरह पढ़ाई की तैयारी करनी पड़ती थी, उस वक्त बैलांे द्वारा खेती व खेती से जुड़े कार्य जैसे खेतों से अनाज, भूसा, पैरा व गेंहॅू की मड़ाई व घर बनाने के लिए मिटट्ी आदि की ढुलाई यह सब कार्य बैलों द्वारा ही किया जाता है। पिता और चाचा जी सुबह 4 बजे उठकर खेतों में हल चलाने जाते उस समय के अनुसार आज के समय के खेती बाड़ी से जुड़े 75 प्रतिशत कार्य कम हो गये हंै।
माता जी के साथ केवल 16 वर्षों तक ही रहा और हाईस्कूल पास करने के बाद जुलाई,1985 में लखनऊ चला आया। माता जी के दांत घर में पली गायों के दूध दुहते समय लात चलाने के कारण जवानी में ही अधिकांश दांत टूट गये, जिससे खाना खाने में काफी कठिनाई हो रही थी, भरपेट खाना न खा पाने के कारण उनकी सेहत दिन पर दिन गिरती ही जा रही थी। उनकी गिरती हुई  सेहत को देखकर मुझे बहुत ही चिन्ता हुई और मैं सांेचता कि जिस दिन मेरे पास पैसे होंगे, उस दिन सबसे पहले मैं अपनी माता जी के दांत लगवाऊंगा। सन् 1987 में कक्षा-11 का वजीफा आया और मैंने माता जी के दांत उसी वर्ष लगवा दिये जिससे वे अच्छी प्रकार से खाना खाने लगी और उनकी सेहत में काफी सुधार आ गया, उनकी वह बतीसी 1987 से 2012 तक जीवनपर्यन्त काम करती रही। 
लखनऊ में ही रहकर पढ़ाई पूरी की और 2 मई, 1995 में मेरी नौकरी लग गयी तथा दिसम्बर, 1996 में शादी हो गयी। शादी के बाद बीबी, बच्चों के साथ रहने लगा, इस बीच गांव महीने-दो महीने में ही आना-जाना होता था, इस कारण माता जी के साथ लम्बे समय तक नहीं रह पाया और जिस तरह से उनकी सेवा करनी चाहिए थी, उस तरह से हम उनकी सेवा नहीं कर सके, फिर भी हमसे जो बन पडा, मैं उनकी सेवा करता रहा था।
लगभग 65 वर्ष की आयु में उन्हें सुगर की बीमारी हो गयी जिस कारण उनकी आॅखों की रोशनी कम हो गयी और मोतियान्दि की गम्भीर बीमारी हो गयी, जिसका आपरेशन 2008 में हुआ, परन्तु सुगर की बीमारी का इलाज मेरे द्वारा कराया गया, लकिन उनके परहेज न करने के कारण इस बीमारी ने उन्हें अपने गिफ्त ले लिया और गुर्दे की बीमारी से ग्रस्ति से हो गयी। 14 अगस्त, 2012 को अचानक वे बेहाश हो गयी और उनकी आवाज चली गयी उसके बाद तीन दिन तक सेठी हास्पिटल, राजाजीपुरम्, लखनऊ/  शेखर हास्पिटल, लखनऊ में आई0सी0यू0 में भर्ती रही, परन्तु कोई सुधार नहीं हुआ और 17 अगस्त, 2012 को उनके दोनों गुर्दे फेल जाने के कारण में इलाज के दौरान ही  उनकी मृत्यु हो गयी, उनकी मृत्यु के बाद हमें बहुत ही धक्का लगा और मेरे ऊपर से माता-पिता दोनों का साया हट गया। जीवन में भाई-बहन, चाचा-चाची, मौसा-मौसी, दादा-दादी और बहुत सारे रिस्ते  आपको मिल जायेंगे परन्तु माता-पिता का रिस्ता जीवन में दोबारा नहीं मिलता, बस रह जाती है, उनकी शेष स्मृतियां और यादें, बस उनकी स्मृतियाॅ ही मेरे जीवन का अवलम्ब हैं।
                                                                                                                                      आगे पढ़ें ------