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मेरी नौकरी


अप्रैल, 1995 का महीना था। गर्मी ने अपना असर दिखाना प्रारम्भ कर दिया था। उस समय हम नौकरी की तैयारी काफी जोरों से कर रहे थे और इधर-उधर विभागों में खूब जगह आदि का विज्ञान हो रहा था और रोजगार कार्यालय से भी सरकारी विभागों में वहाॅ दर्ज अभ्यर्थियों के नाम अलग से भेजे जा रहे थे। अप्रैल माह में ही हमारा भी नाम रोजगार कार्यालय से आई0टी0आई0, अलीगंज में भेजा गया और मेरे द्वारा वहाॅ पर शार्टहैण्ड की परीक्षा दी गयी। उसी दिन परिणाम भी आ गया और हमारा सेलेक्शन वहाॅ पर आशुलिपिक के पद पर हो गया, परन्तु किन्हीं कारणों से वहाॅ पर योगदान कराने में देरी हो रही थी।
इसी के दो दिन बाद हमारा एवं हमारे मित्र इन्द्रजीत मौर्य और अन्य 120 लोगों के नाम रोजगार कार्यालय से कानूनी सहायता परामर्श बोर्ड, जवाहर भवन, लखनऊ में आशुलिपिक पद हेतु भेजे गये। रोजगार कार्यालय से परीक्षा के दो दिन पहले ही एक पोस्टकार्ड मिला, जिसमें लिखा था कि आप अपनी टाइपिंग मशीन साथ लेकर आयें और निर्धारित तिथि को परीक्षा में उपस्थित हों। मैंने पोस्टकार्ड पढ़ा और उसे पढ़कर अलमारी में फेक दिया, क्योेंकि मेरे पास टाइपिंग की मशीन नहीं थी और न ही मशीन किराये पर लेने के पैसे?
परीक्षा वाले दिन लगभग 11ः00 बजे मेरे मित्र इन्द्रजीत मौर्या मेरे कमरे पर आये और कहा कि आज कानूनी सहायता परामर्श बोर्ड में परीक्षा है, वहाॅ तुम परीक्षा देने नहीं चलोगे, तो मैंने कहा कि मेरे पास किराये पर मशीन लेने के लिए पैसे नहीं है, इसलिए मैं नहीं जाऊॅंगा तो उसने कहा कि चलो किराये के पैसे हम दे देंगे, हमने कहा चलो ठीक है। हम दोनों लोग तैयार होकर कमरे पर से परीक्षा देने के लिए निकले और जैसे ही ठाकुरगंज के थोड़ा आगे पहंुचे, वैसे ही मेरी साइकिल की अगली कैंची टूट गयी और हम दोनों लोग जमीन पर मुॅह के बल गिर गये, जिससे हमें बहुत ज्यादा ही चोट आ गयी।
 अब दोनों लोग सोच रहे थे कि अब आगे क्या किया जाये, जिससे जवाहर भवन तक पहुंच जा सके। इसके बाद मौर्या के एक मित्र मिल गये और उन्होंने हम लोगों को देखा और पास आये, पूछा क्या हो गया और कहाॅ जा रहे हो, हमने उनको अपनी पूरी बात बतायी तो उन्होंने कहा कि आप लोग मेरी साइकिल ले जाये और लौटते वक्त मेरी साइकिल मुझे वापस कर देना, हमने कहा चलो ठीक है, ऐसा ही करते हैं। साइकिल लेकर हम दोनों चल दिये और रास्ते में सोचने लगे कि अब तो काफी समय हो गया है और अब परीक्षा समाप्त हो चुकी होगी, चलो अब घर लौट चले परन्तु मेरे मित्र ने कहा देर हो गयी है, तो क्या हुआ चलो हम लोग नावेल्टी में पिक्चर देखते हैं।
यही सोचकर हम लोग नावेल्टी सिनेमा गये, परन्तु वहाॅ भी देर होने के कारण टिकट खिड़की बन्द हो चुकी थी और हम लोगों को टिकट न मिलने के कारण वहाॅ से लौटना पड़ा। रास्ते में एक लड़का मिला, जो हमारे साथ कार्मिशयल में पढ़ता था, वह परीक्षा देकर वहीं से लौट रहा था, उसने कहा कि आप लोग वहाॅ नही गये, आप दोनों का नाम बार-बार पुकारा जा रहा था। इस पर हमने कहा कि मेरे पास मशीन नहीं थी, इस कारण हम परीक्षा देने नहीं गय,े तो उसने बताया कि वहाॅ पर किराये की मशीन मिल रही थी, हमने कहा कि मेरे पास पैसे नहीं है उसने कहा ठीक है और यह कह कर वह आगे बढ़ गया।
मैंने अपने मित्र से कहा कि चलो इस समय गर्मी काफी हो रही है, चलो जवाहर भवन टहल आते हैं और कुछ देर वहीं पर ए0सी0 की हवा खायेंग,े उसने कहा चलो ठीक है और हम दोनों लोग लगभग 2ः00 बजे जवाहर भवन पहंुच गये। वहाॅ पर परीक्षा समाप्त हो चुकी थी और कापियाॅ जाॅचने का कार्य चल रहा था। उसी समय हम दोनों हाॅफते और पसीना पोंछते हुए हाल में दाखिल हुए, वहाॅ पर उपस्थित अधिकारी/कर्मचारीगण पूछने लगे आप लोग अन्दर कैसे आये, हमने कहा कि हमारी आज आशुलिपिक की परीक्षा है तो उन्होंने कहा कि अब परीक्षा समाप्त हो चुकी है। परीक्षा का समय 1ः00 बजे तक था और जो लोग उपस्थित थे, वे लोग परीक्षा देकर जा चुके हैं अब यहाॅ पर कापियाॅ चेक हो रही हैं, अब तुम्हारी परीक्षा नहीं होगी।
हम लोग अपनी रोनी सूरत बनाकर वहीं पर बैठ गये, थोड़ी देर में उसी हाल में जज साहब आ गये और उन्होंने हम लोगों को हाल में बैठा देखा और कहा कि यह दो लड़के हाल में अब क्यों बैठें हैं। इस पर उनके प्रशासनिक अधिकारी ने जबाव दिया कि यह दोनों देर से आये और इनकी परीक्षा छूट गयी। हमने इनको बता दिया है कि अब तुम्हारी परीक्षा नहीं हो सकती।
यह सुनकर जज साहब ने हम दोनों को बंुलाया और कहा कि देर से क्यों आये, तो हमने कहा कि हम लोग मलिहाबाद से साइकिल से आ रहे थे परन्तु बीच रास्ते में ही मेरी साइकिल की कैंची टूट गयी, इस कारण हम लोगों को काफी देर हो गयी, इस जज साहब ने अपने प्रशासनिक अधिकारी से कहा कि जब तक कापियाॅ चेक हा रही हैं, तब तक इन दोनों की परीक्षा ले लो, तो प्रशासनिक अधिकारी ने जज साहब से कहा कि यह लोग अपनी मशीन साथ में नहीं लाये हैं, इस कारण इनकी परीक्षा नहीं हो सकती।
जज साहब ने कहा कि मेरा आफिस तो एक मंजिल ऊपर तो ही है, आफिस से दो मशीन मंगाकर इनकी भी परीक्षा ले लों। अब जज साहब का आदेश था, तो उन लोगों को पालन करना ही था। शार्टहैण्ड का डिक्टेशन देने के बाद हम दोनों को जज साहब ने बड़ी दूर-दूर अलग बैठा दिया और कहा कि आप लोग आपस में बात मत करना, नही ंतो तुम्हारी परीक्षा रद्द कर दूंगा। मेरे पहले 87 लड़के परीक्षा देकर जा चुके थे हम दोनों लोग परीक्षा देकर वापस अपने कमरे पर आये गये।
तीसरे दिन मैं अपनी चाची जी के यहाॅ गया जो राजाजीपरम् में रहती हैं, के यहाॅ गया, तो चाची जी ने बताया कि तुम्हारा मेरा काल लेटर कानूनी सहायता परामर्श बोर्ड से आया हुआ है, उसे लेकर मैं दूसरे दिन आफिस पहुंचा, तो पता लगा कि मेरे अलावा और वहाॅ पर और कोई अभ्यर्थी पास ही नहीं हुआ है। प्रशासनिक अधिकारी महोदय ने मुझे जज साहब से मिलवाया और उनको अवगत कराया कि सर आशुलिपिक की परीक्षा में मात्र यही पास हुये हैं और कोई अभ्यर्थी पास नहीं हुआ है, इस पर जज साहब  ने प्रशासनिक अधिकारी को आदेश दिया कि इन्हें आज ही ज्वानिंग लेटर उपलब्ध करा दो और आज ही योगदान कर कर लें। मैं उसी दिन 2 मई, 1995 को ही उक्त कार्यालय में योगदान कर लिया और अपनी पहली शासकीय सेवा शुरू कर दी। आफिस की एक घटना का उल्लेख यहाॅ पर कर रहे--
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