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मेरी शादी


इसी वर्ष मई,1996 में मेरी बहन की चचिया ससुर ने मेरा रिस्ता बाग नं0-2 से तय कराया गया और जून, 1996 मं मेरी बरीक्षा व गोदभराई की रस्म हो गयी और शादी आगे के लिए टल गयी। माह 18 अक्बटूर, 1996 को मेरा तिलक गांव में दिनै दिन में बड़ी धूम-धाम से हुआ और शादी की बात 12 दिसम्बर, 1996 की तारीख तय हुई। इसी बीच 7 नवम्बर,1996़ को हमारे भतीजे का जन्म हुआ घर में एक सदस्य बढ़ जाने से और हमें और माता-पिता को पोता पाने की अपार खुशी हुईर्। घर काफी लोग उत्साहित थे और भतीते के आने के खुशी में गाव और लखनऊ दोनों जगह मिठाइयों का दौर कई दिन चला।
 इसी बीच नवम्बर में ही मेरी तबियत बहुत खराब हो गयी और मुझे टाइफाइड हो जिससे हमें बहुत ही कमजोरी आ गयी और बड़े भइया के पैर में चोट लग गयी इस कारण दौड़ने भूपने वाला कोई नहीं बचा काफी दिक्कते आ गयी हमने शादी टालने का प्रयास किया परन्तु मेरी ससुराल पक्ष वाले कहने लगे कि काफी इन्तजाम हो गया और अब शादी मत टालों किसी तरह निपटा लिया जाय।
12 दिसम्बर को शादी की तैयारियाॅं काफी जोरो पर थी और सभी रिस्तेदार एक दिन पहले ही आ चुके थे परन्तु होनी को कौन टाल सकता है उसी दिन मेरे मझले मामाजी  (भूप प्रसाद) का आाकस्मिक निधन हो गया है। मृत्यु की खबर जैसे ही हमारे गांव पहुंची मेरे घर मं कोहराम मच गया और हमारी माता जी यह सुनकर बेहोश हो गयी शादी में हमारी मामी और मामा की लड़किया और मौसी सभी लोग आये हुऐ थे परन्तु मामा जी की मृत्यु की खबर सुनकर सभी लोग मामा जी के घर कुण्डरा खुर्द चले गये और घर में पूरा सन्नाटा छा गया है मुझे भी मामा जी मौत का काफी दुख हुआ क्योंकि मेरे मामा जी काफी पढ़े लिखे थे और हमें बहुत प्यार करते थे। जब कभी मेरे गांव आते तो गांव वाले उनसे आल्हा गवाते और मछली खाने के बहुत शौकीन थे इसलिए उनसे तालाब में जाल डालकर मछली भी पकड़वातंे।
मेरी बारात विदा हो रही थी परन्तु मेरी माता जी उस समय उपस्थित नहीं थी इस कारण मैं बइुत दुखी था और काफी रोया भी मेरी चाची के बहुत समझाने बुझाने के बाद ही मैंने बारात वाले कपड़े पहने और तैयार हुए। तैयार होने के बावजूद हमने कहा कि जब तक मेरी बुंआ (माता जी) नहीं आ जाती तब तक मैं अपनी बारात लेकर नहीं जाऊॅगा। बैण्डबाजे वाले द्वार पर तैयार खड़े थे और घर के अन्दर नाच गाना चल रहा था परन्तु मेरी माता जी नहीं थी इसलिए मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था चाची के कहने पर किसी तरह मैं दूल्हा बना और कुआॅ ब्याहने के लिये तैयार हुआ और कुआॅ ब्याहने के समय ही मेरी माता जी वहाॅ पर पहुच गयी, तब जाकर मैं बारात जाने के लिए तैयार हुआ और मै अपनी माता जी से लिपटकर बहुत रोया, जैसे मानो लड़के बारात न होकर लड़की की बारात विदा हो रही है। इस तरह 12.12.1996 को रतना वर्मा से मेरी शादी हो गयी।
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