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नानी की बकरी



मेरी नानी जी ने मुझे एक बकरी की बच्ची सफेद रंग की दिया थां वह सफेद रंग की बकरी इतनी खूबसूरत थी कि जैसे अभी आसमान में उड़ने लगेगी और दूर से देखो तो ऐसा लगता था कि वह रूई के फीहे जैसी मालुम होती थी और हमारे यहॉ वह जब से आयी हम सब भाई बहन स्कूल से आने के बाद उसी के साथ खूब खेलते और अपना खाना तक उसको खिला देते। 

एक वर्ष बाद उसके कई और बच्चे हुए और उस बकरी का परिवार बढ़ने लगा। जब हम बयारी गांव स्कूल से लौटते और लौटते वक्त जैसे ही हम अपने बाग के पास पहुंचते थे, तो उस समय शाम के लगभग 4 बज जाते थे और इतने समय तक बकरी बहुत ही भूखी हो जाती थी, वह भूख के मारे इतनी जोर से चिल्लाती थी कि उनकी आवाज हमारे कानों में पड़ती, तो मैं बहुत दुखी हो जाता और उन बकरियों के लिए रास्ते में पड़ने वाले खेतों से घास या पेड़ों से कुछ पत्ते तोड़कर ले जाते जिससे वे तब तक शान्त रहे जब तक मैं खाना न खा लूं। क्योंकि पढ़ाई करने के बाद बकरियों को चराने हम लोगों को ही जाना पड़ता था। 
उसी वर्ष जाडे़ के समय गांव में बकरियों में कई तरह की काफी बीमारियॉ फैल गयी जिससे हमारी सारी बकरिया मर गयी और उनमें एक बकरी के दो छोटे-छोटे बकरे के बच्चे बचे जिन्हें मै बहुत ही प्यार करता, उन्हें गाय का दूध पिलाता और अपने बिस्तर पर ही लिटाता था और वे मुझसे इतना ज्यादा हिले हुए थे कि अक्सर वे मेरे ऊपर ही चढ़कर बैठते थे। अभी लगभग मात्र 5 महीने के ही हुए थे कि गांव के ठाकुर श्री शिवपाल सिंह जो गांव में ही कपड़े की दुकान रखे हुए थे, उनकी दुकान से जाड़े के समय हम सभी के लिए पिता जी कपड़े उधार लाये थे और कपड़े लेते समय पैसा चुकाने के लिए उन्होनें आम की फसल बेचने पर देने का वादा किया था, परन्तु आम की फसल अच्छी न होने के  कारण उनके उधार के पैसे समय से नहीं दे पाये। 
इसके पहले भी पिता जी से कई बार अपनी उधारी के पैसे मांग चुके थे, पैसा न अदा करने से वह पिता जी से काफी नाराज चल रहे थे, परन्तु हर बार पिता जी कुछ न कुछ बहाना बनाकर अगले महीने देने का वादा कर देते थे। अषाढ़ माह की पंचमी को  जुलाई माह में हमारे गांव में बहरू बाबा का प्राचीन मसहूर एक स्थानीय मेला लगता है, उस मेले में काफी दूर-दराज से रिस्तेदार/मेहमान व मित्रगण मेला देखने आते हैं। इस मेले में तरह-तरह की दुकाने, झूले, घरेलू सामान व बकरे का मीट की दुकानें भी काफी मात्रा में लगती है और वहीं बकरों की खरीद-फरोखत भी खूब होती है। इस मेले में लगभग 15 से 20 कि0मी0 तक की दूरी से लोग बकरे का मीट खरीदने के लिए आते हैं यह परम्परा काफी समय से चली आ रही है और आज भी अनवरत् जारी है। 
  श्री शिवपाल सिंह मेले वाले दिन ही अपनी उधारी पिता जी से मांगने आ गये और कहा आज ही हमें पैसा चाहिए, परन्तु पिता जी अपनी विवशता जताते हुए कहा कि आज हमारे पास पैसे नहीं है, इस समय हमारे यहॉ काफी रिश्तेदार/मेहमान मेला देखने आये हुए हैं और आज वैसे ही मेला होने के कारण काफी खर्चा है, आपके पैसे आज नहीं दे पाऊॅगा। इस पर वह काफी आक्रोशित हो गये और कहा कि पैसा तो हम आज ही लेगें, बिना पैसे हम आज नहीं जायेगें अब तुम्हारा कोई बहाना नहीं चलेगा और चाहे जैसे तुम व्यवस्था करो हम नहीं जानते। श्री शिवपाल सिंह ने कहा कि तुम्हारे पास दो बकरे के बच्चे है उन्हें ही बेचकर पैसे दे दो, पिता जी ने कहा कि अभी यह बकरे बहुत ही छोटे हैं और इनके तो अभी दांत तक नहीं निकले इन्हें कैसे बेच दें, उनके मना करने पर वे उस समय वहॉ से चले गये और थोड़ी ही देर में अपने साथ चिकवा (बकरे का व्यापारी) लेकर आये और कहा कि इन्हें बेचकर हमें आज ही पैसा दे दो। 
उस समय मेरे घर पर काफी मेहमान बैठे हुए थे और वह अपनी बात पर अड़ेेे हुए थे और बहुत ही आक्रोशित हो रहे थे, उनक आक्रोश को देखकर पिता व परिवार के अन्य लोग उनके तेवर को देखकर सहम गये। घर पर बैठे मेहमानों के आगे वह पिता जी की काफी बेइज्जती करने लगा और कहने लगा कि अभी बकरे बेच कर पैसे दो। घर में वही दो छोटे-छोटे बकरे थे और वे दोनों बकरे के बच्चे उस दिन वहीं पर इधर-उधर उछल कूदकर काफी मस्ती में खेल रहे थे,उन्हीं दोनों के साथ हम भी खेल रहे थें परन्तु मुझे उनके बिकने की बात को लेकर कोई ज्ञान नहीं था। इस बार पिता जी का कोई बहाना काम नहीं आया और उनकी बेइज्जती इससे ज्यादा न हो इसलिए पिता जी उसके आगे विवश हो गये और कर्ज के आगे उन्हें झुकना पड़ा और उसी समय वे दोनों बकरों को मात्र 42 रूपये में बेचना पड़ा और वह अपने पेसे लेकर चले गये, उन बकरों के बिकने की खबर जब हमें हुई तो मैं उस दिन बहुत रोया, न कुछ खाया और न ही कुछ पिया और मेला न देखने जाने के लिए प्रण किया कि मेरे दोनों मासूम दोस्त मुझसे बिछड़ गये। 
मैं इसी गम में डूबा हुआ था कि फिर कुछ देर बाद मैं सोचा कि मेला जाऊ और चिकवा से कहें कि उन बकरों को वह न काटे और हम एक दो दिन में पिता जी से कहकर इन्हें छुड़ा लेंगे, परन्तु जब मैं मेला पहुंचा और ढूढ़ते-ढूढ़ते उस चिकवा की दुकान पर जाकर पहुंचे तब तक उसमें से मेरा एक बकरा कट चुका था और दूसरा थोड़ी दूरी पर रस्सी से बधा हुआ धूप में जोर-जोर से भूंखा-प्यासा अकेले चिल्ला रहा था। 
यह मंजर देखकर मेरी ऑखों के सामने अंधेरा छा गया और मैं उसको गले लगाकर बहुत रोया और वह मेरा कान, मुॅह और हाथ सभी अपनी जबान से चाटने लगा, उस समय उसकी दशा मुझसे देखी नहीं जा रही थी और इस दृष्य को मेला घूमने आये काफी लोग देख रहे थे और मन नही मन वह भी दुखी हो रहे थे, परन्तु होनी को कौन टाल सकता है, अभी एक ही मिनट हुआ होगा हमें उसे दुलराते हुए इसी समय थोड़ी ही देर हुई थी और मैं उससे कुछ बात करता इसके पहले ही चिकवा का दूसरा आदमी आया और तुरन्त ही उसे गोदी में उठाकर ले गया और अपनी दुकान के पीछे मेरी ऑखों के सामने ही उसे भी काट दिया। उस चिकवे के आदमी ने मेरी एक भी नहीं सुनी और कहा कि बकरे की मॉ कब तक खैर मनायेगी, इसको तो एक न दिन कटना ही है। 
अब आप सोच सकते हैं कि उस समय मेरे बालमन पर क्या बीता होगा, इसका अनुभान सहज ही लगाना असभव है।  उनकी याद में मैंने कई दिन तक अच्छी प्रकार से खाना नहीं खाया और पिता जी से बचन लिया कि अब कभी भी इस घर में बकरी नहीं पाली जायेगी। उस दिन से आज तक मेरे पिता जी जीते घर में बकरी नहीं पाली और न ही किसी और को घर में बकरी पालने दिया। उक्त घटना को घटे लगभग 45 वर्ष हो गये परन्तु आज भी जब मैं किसी बकरे के बच्चें को देखता हॅू तो उक्त घटना मेरी ऑखों के सामने छप जाती है और मैं काफी दुखी और द्रवित हो जाता हॅू। 
उक्त स्कूल में तैनात सभी अध्यापक काफी दूर से आते थे इस कारण प्रत्येक दिन अध्यापक उपस्थित नहीं होते थे, हम लोग स्कूल जाते और खेल कूद कर घर लौट आते । अध्यापको के नियमित न आने से पढ़ाई अच्छी नहीं होती थी और हम लोग अपने आप ही जो कुछ समझ में आता वही पढ़ते थे। लेकिन वहॉ भी छूआ-छूत हावी थी पीने को पानी नहीं मिलता था स्कूल के पास ही एक तालाब था, उसी तालाब में हम लोग पानी पीते थे गर्मियों में उक्त तालाब का पानी सूख जाता था तो गांव के अन्दर बाजार लगती थी वही पर एक कुऑ था, जो मेरे एक दोस्त सरवन कश्यप के घर के पास था वहीं हम लोगों को अपनी बाल्टी से भरकर दूर से पानी पिलाता था। कक्षा-6 किसी तरह बयारीगांव से पास किया उसी वर्ष वह स्कूल अध्यापकों के अभाव में बन्द हो गया जिस कारण हम लोगों को आगे की शिक्षा यानी कक्षा-7 की पढ़ाई बाधित हो गयी और अब आगे की पढ़ाई कहॉ की जाये। यहॉ पर मैं कक्षा-6 के समय की एक घटना का उल्लेख कर रहा हॅूः-  
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