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परचून की दुकान


अक्टूबर का महीना था, गर्मी का मौसम लगभग विदा होने वाला है और सर्दी के मौसम ने अपने आने की दस्तक दे दी हैे। धान, मक्का, बाजरा की फसल पककर तैयार हो रही और कहीें-कहीं गेहॅूं, चना, आलू व अन्य रबी की फसलों की बुवाई प्रारम्भ हो चुकी थी। हम भी पिता जी के साथ थोड़ी बहुत देर खेत में काम करते, परन्तु क्वार का महीने में आसमान साफ होने कारण धूप बहुत ही तेज होती है, इस कारण खेत से जल्द ही भाग आते और फिर दिन भर खाली घर पर इधर-उधर घूम-घाम कर समय काटते, मोहल्ले वाले परेशान करते कि आप खाली हो तो भइया मेरा यह काम कर दो, मेरा वह काम कर दो, यहाॅ चले जाओं, वहां चले जाओ, जिसे देहातों में बेेगारी कहते हैं।
 जिसका काम न करो तो वह बात-बात पर नाराज हो जाता और कहता कि तुम घर पर खाली ही तो बैठे हो और क्या करोगे, पढ़ाई तो तुम अब करते नहीं। इन बातों को सुन-सुनकर मैं बहुत दुखी होता और परेशान होता कि आखिर क्या किया जाय कि लोग मुझे बेकार या निठ्ठला न कहंे, और लोगों की बेगार न करनी पड़ी। घर में बैल, गाय, भैस पली हुई थी उन्ही को चराने व उनके लिए चारा खेतो से लाना होता था और उसे मशीन से काटकर सभी जानवरों को खिलाना होता था या फिर खेतों में छोटा-मोटा काम करने के लिए बताया जाता वह भी मेरे द्वारा किया जाता था, परन्तु इन कामों की कोई कीमत नहीं होती है, आप चाहे जितना कार्य करें, लेकिन आपको कोई इज्जत नहीं देगा।
किसी तरह बड़े भइया का फार्म दादी के कुछ जेवरात गिरवी रखकर भरने के लिए रूपये मिल पाये थे, पैसे के अभाव में मेरा हाईस्कूल का फार्म नहीं भराया जा सका।  कुछ माह बाद अब मैं बहुत परेशान होने लगा कि ऐसे काम नहीं चलेगा, कुछ तो करना ही होगा। घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण कोई रोजगार भी कर सकता था। कुछ दिन सोचने के बाद यह मन में आया कि गांव में परचून की दुकान खोली जाय, परन्तु पैसे कहाॅ से आयंे। बहुत ही सोच-विचार करके घर में गाय का एक छोटा बछड़ा बेचा जाय जिससे कुछ पैसे इक्ट्ठा हो जायेगें।
उस बछड़े को बाजार ले गया और उसे बाजार में 300 रूपये में बेच दिया। उन रूपये में कुछ रूपये घर के काम में लगे और लगभग 200 रूपये से परचून की दुकान खोली। उक्त दुकान को गंाव की बाजार और बयारी गांव की बाजार में लगाता था। दुकान का सारा सामान साइकिल से मलिहाबाद/रहीमाबाद या फिर यहियागंज, लखनऊ से लाता और गांव में ही बेचत, किसी तरह वह दुकान लगभग दो वर्ष चलायी, परन्तु गांव में कुछ ऐसे ग्राहक थे, जो परेशान करने के वास्ते 5 पैसे की बीड़ी बार-बार लेने आते और हद तो तब होती थी जब वे आधी रात को 5 पैसे की बीड़ी ले आते और हमें सोते हुए जगाते तब मुझे बहुत खराब लगता, मेरे मना करने पर वे लोग बिगड़ जाते और कहते हैं कि दुकान रखे हो तो ग्राहक चाहे जिस समय आये, सौदा तो तुम्हें देना ही होगा। कभी-कभी तो इतना मन खराब हो जाता था कि दिल करता था कि ले डण्डा और सालों को खूब पीटें, परन्तु ऐसा करना बहुत नामुंकिन था, क्योंकि ग्राहक गांव के ही होते थे और उनसे झगड़ना दुश्मनी मोल लेने के बराबर था।
इन्ही परेशासनियों से तंग आकर मैंने फिर आगे पढ़ने का मन बनाया और वर्ष 1985 में आगामी वर्ष 1986 की परीक्षा में बैठने के लिए मैंने फिर से हाईस्कूल का फार्म गिरधारी सिंह इन्दर कुॅवर इण्टर कालेज, अशर्फाबाद, लखनऊ से भर दिया। दुकान चलाने के साथ-साथ घर पर ही पढ़ाई करने लगा। यहाॅ पर बयारीगांव बाजार की एक छोटी से घटना उल्लेख कर रहा हॅूः-
होली का त्योहार आने वाला था, हर तरफ बंसती फूल चारो ओर रंग-बिरंगे खिले हुए थे। हर घर में त्योहार होने के कारण साफ-सफाई व लिपाई, पुताई का कार्य जोरो पर चल रहा था। मेरे भी घर में साफ-सफाई व लिपाई-पुताई का कार्य चल रहा था, उसी में हम भी घरवालों का सहयोग कर रहे थे। इसी बीच दोपहर को हमारे मोहल्ले के ही रामप्रसाद, जो रेडीमेट कपड़ों की दुकान चलाते थे, आये और कहा कि होली का त्योहार है और आज क्या बयारीगांव की बाजार में दुकान नहीं ले चलोगे, हमने कहा कि घर में काम बहुत ज्यादा है इस कारण आज बाजार नहीं जायेगें। परन्तु उन्होंने त्योहार का हवाला देते हुए कहा कि आज बिक्री ज्यादा होगी और बधे हुए ग्राहक लौट जायेगें, जो आगे व्यापार के लिए अच्छा न होगा।
खैर कुछ सोच विचार कर हमने कहा ठीक है, चलो चलते हैं और हम दोनों लोग अपनी-अपनी दुकान लेकर बयारीगांव बाजार में पहुंचकर अभी दुकान सजा ही रहे थे कि अचानक कई ओर गोलियाॅ चलने की आवाजें आने लगी, सारे बाजार में गोलियों की आवाजें सुनकर हर तरफ अफरा-तफरी मचने गयी। देखते ही देखते पूरी बाजार में सन्नाटा छा गया, गोलियो की आवाज सुनकर मैं भी अपनी दुकान में रखे नमक के बोरे के पीछे छिप गया, थोड़ी ही देर में मेरी तरफ दनदनाते हुए एक गोली के कुछ छर्रे आये और मेरे पैर में धस गये और मैं बहुत ही तेजी से कराह उठा, तभी देखा कि बगल में तोंदा का मनिहार चूड़ी की दुकान सजा रहा था, चूड़ी वाले का लड़का जमीन पर लहूलुहान पड़ा हुआ है, यह देखकर मैं बहुत ही घबरा गया और उसे बोरी की ही आड़ से देखने लगा कि यह जिन्दा है या मर गया। उस समय का मंजर मुझसे देखा नहीं गया और मैं मारे डर के वहीं पर बेहोश हो गया। कुछ देर बाद रामप्रसाद जी आये और मुझे झकझोर का होश में लाये और कहा जल्दी से भागों अपने गांव के ही महेन्द्र सिंह बहुत ज्यादा ही घायल हो गये, जिन्हें ट्रेक्टर पर लाद कर थाना औरास लिये जा रहे हैं। हमने उनसे पूछा भइया हुआ क्या है कि अचानक गोलियाॅ चलने लगी। उन्होंने  बताया कि पंडितों और भुड़जियों में किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया और बयारीगांव के पडितों की ओर से अपने गांव के महेन्द्र सिंह और उनके साथी गोली चला रहे थे और उधर से गोली महेन्द्र सिंह के लगी जो काफी घायल हो गये हैं।
कुछ दिन बाद महेन्द्र सिंह की दूसरे गांव में गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। परन्तु उक्त घटना से दोनों गांवों की बाजारों में काफी दिन सन्नाटा रहा, लोगों का एक दूसरे गांव में कई महीनों तक आना-जाना बन्द रहा और मैंने भी उसी दिन से बयारी गांव की बाजार में दुकान लगाना बन्द कर दिया। आज भी उस घटना को याद कर मेरी आॅखों के सामने वहीं मंजर नजर आता और दिल सहम जाता कि क्या समय था वह।
इसी वर्ष हमारे गांव मंें पशुधन प्रसार अधिकारी (जानवरों के डाक्टर) श्री सीताराम, जो इलाहाबाद के रहने वाले थे, की तैनाती मेरे गांव में हो गयी। डा0 साहब प्रतिदिन औरास से साइकिल से गांव आते और सायंकाल तक फिर औरास वापस चले जाते थे। लगभग दो तीन महीने तक वह औरास से आते-जाते रहे। इसी बीच एक दिन नहर पर मेरी मुलाकात उनसे हो गयी और बातचीत करने पर पता चला कि वह हमारी ही विरादरी के है, जानकर बहुत खुशी हुई और उन्हें मैं अपने घर ले आया और पिता जी से और मोहल्ले के कई लोगों को उनके बारे में बताया और उनसे मिलवाया।
गांव के सभी लोग बहुत खुश हुए और उनसे यही पर रहने के लिए आग्रह करने लगेे कि आप रोज-रोज औरास न जाकर आप यही हमारे मोहल्ले में रहें। वैसे आप अकेले ही रहते है। ना नकुर करने बाद उन्होंने कहा कि चलो आप लोग अपने हैं, तो यही रहते हैं। लगभग 15 दिन तक मेरे यहाॅ रहे, फिर किशुन बाबा के कमरे में रहने लगे और वहीं पर खाना स्वयं बनाने खाने लगे।
कुछ दिन बाद किशुन बाबा की पत्नी जो काफी समय से बीमार चल रही थी, उनकी मृत्यु हो गयी, उसके बाद बाबा ने कहा कि हम लोगों का खाना घर में बनता ही है। आप भी हमारे साथ ही घर पर खाना खा लिया करें, उसके बाद से डाक्टर साहब बाबा के घर पर ही खाना खाने लगे। कहा चलो सुबह-शाम खाना बनाने के झंझट से मुक्ति मिल गयी।
 इसलिए अब उनके पास समय काफी बचने लगा, तो डाक्टर साहब ने कहा कि मोहल्ले के जोे भी लड़के-लड़कियाॅ पढ़ना चाहंे, उन्हें मैं शाम को पढ़ाऊॅगा। मेरे मन भी आगे पढ़ने की तमन्ना तो थी ही और फिर मैं हाईस्कूल का प्राइवेट फार्म भी भर चुका था, तो मैं भी रात्रि 8 बजे दुकान बन्द कर खाना खाकर डाक्टर साहब के पास गणित की पढ़ाई करने जाना लगा। वेे हमें बहुत ही अच्छी तरह से गणित समझाते थे और उन्हीं की पढ़ाई हुई गणित से मैंने वर्ष 1986 में हाईस्कूल की परीक्षा दी और मैं इस वर्ष पास हो गया। मेरे पास होने पर सबसे ज्यादा खुशी डाक्टर साहब को हुई और उन्होंने मोहल्ले के अन्य बच्चों को बताया कि आप लोग भी इसी तरह पढ़ाई करे तो आप भी आगे बढ़ सकते हैं।
क्योंकि उस जमाने में हमारे मोहल्ले में बहुत ही कम लोग पढ़े लिखे थे और जो थे भी उन्हें बाहरी दुनिया से कोई मतलब नहीं था, परन्तु डाक्टर साहब रोज औरास ब्लाक जाते और कभी-कभी जनपद-उन्नाव मींटिंग आदि में जाते इस कारण उन्हें हर प्रकार की शासकीय जानकारी होती और गांव स्तर पर सरकार द्वारा क्या योजनाएं चलाई जा रही हैं, उनकी उनको अच्छी तरह से जानकारी होती थी।
वह जानकारी गांव में सभी को बताते और कहते थे कि सरकार द्वारा यह योजना चलाई जा रही हैं, इममें आप लोग फार्म भरे तो रोजगार करने के लिए सरकार द्वारा छूट पर पैसा मिलेगा, जैसे मुर्गी, पालन, भैंस पालन, दुकान खोलने आदि छोटे-छोटे रोजगार करने के लिए 50 प्रतिशत छूट पर पैसा दिया जाता है। उनके द्वारा दी गयी जानकारी से काफी लोग लाभान्वित भी हुये और पूरी ग्राम पंचायत में उनकी काफी सराहना भी हुई तथा उनको सभी लोग काफी इज्जत देते थे।
                                                                                                                             आगे पढ़ें -------