Artikel Terbaru

जीवन परिचय



मेरा जन्म 05 सितम्बर, 1969 (अभिलेखों में दर्ज 05.09.1966) मेरे माता-पिता के अनुसार मास आषाढ़ की पूर्णिमा को सायं 06 बजे ग्राम-हसनपुर पश्चिम बाव, पोस्ट- रामपुर गढ़ौवॉ, विकास खण्ड-औरास, तहसील-हसनगंज, जनपद-उन्नाव में हुआ। मेरी प्रारम्भिक शिक्षा कक्षा-5 तक प्राइमरी पाठशाला, हसनपुर पश्चिमबाव में ही हुई। कक्षा 01 से 05 तक मेरे साथ पूरी ग्राम सभा के जो मित्र पढ़ते थे, उनमें से कुछ दोस्तों के नाम अपनी जीवनी में अंकित कर रहा हॅू जिनमें से अमृत लाल मौर्य, लालता मौर्य, नीलम श्रीवास्तव, मिथलेश िंसंह, विमला सिंह, राजकुमार सिंह, पूपेन्द्र सिंह, शैलेन्द्र सिंह, अवघेश सिंह, रेशमा खान, रघुवीर प्रसाद, सुभाष  चन्द, सजीवन लाल, राजकुमार पाल, प्रेम प्रकाश पाल, छत्रपाल, छोटेलाल, फूलचन्द्र, प्रकाश चन्द्र, उमाशंकर, रामू, छेदीलाल, सुरेश कुमार, सुरेश प्रसाद, तुलसी राम, रामऔतार, शिवकली अन्य भी काफी लोग थे, परन्तु उनके नाम याद नहीं है।

       प्रारम्भिक शिक्षा कक्षा-5 तक प्राइमरी पाठशाला, हसनपुर पश्चिमबाव में ही हुई। हम अपने बड़े भाई साहब के साथ जाने लगे, उस समय मेरी उम्र लगभग 5 वर्ष की रही होगी और हमें बाहरी दुनिया में क्या हो रहा है, इसका हमें कोई ज्ञान नहीं था। क्योंकि जहॉ मेरा घर है, वहॉ पर सब एक ही जाति बिरादरी के लोग रहते थे तो हमें घर के आस-पास रहने वालों के घरों में खेलने-कूदने व उसके साथ के बच्चों के साथ खाना-पीना आदि की कोई रोक-टोक नहीं थी। इसी कारण जब हमारा दाखिला गांव के ही स्कूल में हुआ और वहॉ गांव के अन्य बच्चों के साथ मैं बैठना चाहता तो उनके साथ बैठने से मना कर दिया और मुझे अलग एक दूसरी पीछे की लाइन में बैठा दिया जाता, मुझे इस बारे में कोई ज्ञान नहीं था कि हमें अन्य बच्चों से अलग क्यों बैठाया जा रहा है, परन्तु दिन में मुझे पानी पीना हुआ और पानी पीने के लिए मैंने कक्षा से बाहर रखी बाल्टी से पानी निकाल कर पीने लगा तो स्कूल के अन्य बच्चे बड़ी जोर चिल्लाने लगे कि मुन्सी जी देखो अछुत जाति का लड़का बाल्टी से लोटा निकाल कर पानी पी रहा है। मेरे पानी पीते हुए देख मुन्सी जी बड़ी जोर से चिल्लाये कि तुमने बिना पूछे बाल्टी कैसे छू लिया और बाल्टी से दूर रहने के लिए डांटा, इस पर मेरे बड़े भाई ने कहा कि उसको अभी यह पता नहीं है कि यहॉ पर बाल्टी लोटा छूना मना है। मेेेरे बाल्टी छूने के बाद उक्त बाल्टी लोटा को आम के सूखे पत्तों को जलाकर उस बाल्टी को पवित्र किया गया। आग से शुद्धिकरण के उपरान्त ही उस बाल्टी में स्वर्ण बच्चों ने दोबारा पानी पीना चालू किया। उस घटना के बाद मुझे पता चला कि मानव जाति में भी कोई ऊॅच-नीच होता है।  मेरे गांव में बहुत छूआछुत, ऊॅच-नीच और काफी भेदभाव था। हम लोगों को बैठने के लिए साथ में बोरा या चटाई घर से ले जाकर ऊॅची जाति वाले बच्चों से दूर अलग बैठना होता था। जबकि उस वक्त दो अध्यापक स्कूल में तैनात थे और वे दोनों अध्यापक अनुसूचित जाति (पासी) जाति के ही थ,े परन्तु सामन्तवादी व्यवस्था से इतना डरते थे कि वे हम लोगों को चाह कर भी एक साथ बैठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। स्कूल सुबह 10 बजे से सायंकाल 05 बजे तक लगता था, इस बीच यदि हमें प्यास लगती थी तो ऊॅची जाति के लड़के बाल्टी लेकर कुॅआ से पानी भरकर हमें बिना हाथ धोये हुए ही हाथ से चुल्ल्ू बांधकर पानी पिलाते थे यदि उनका पानी पीने का मन नही है तो वे लोग कुॅआ से पानी नहीं भरते और ऐसी स्थिति में यदि प्यास लगे तो हमें या तो स्कूल के पास बने तालाब में पानी पियें या फिर नहर में पानी पीने आना पड़ता था, नही ंतो दिन भर प्यासे ही रहो। जैसे-तैसे मैं कक्षा-1 से कक्षा-5 तक पहुंचे, उस समय कक्षा-5 की परीक्षाएं बोर्ड द्वारा करायी जाती थी, इसीलिए मेरी भी कक्षा-5 की परीक्षा मई, 1978-79 में बोर्ड द्वारा कराये जाने की सूचना दी गयी और मेरा सेन्टर ग्राम बछौली, औरास, उन्नाव में गया, जो मेरे गांव से लगभग 10 कि0मी0 की दूरी पर है। उक्त परीक्षा केन्द्र तक मैं और मेरे सहपाठी सुरेश कुमार व मेरे बड़े भइया तीनों लोग एक साथ एक दिन पहले ही पैदल चलकर जूनियर हाई स्कूल, बछौली सेन्टर पर पहुंच गये। रात्रि में गांगन गांव में अपनी मौसी के घर रूके और प्रातः सत्तू खाकर ही पूरा दिन परीक्षा दी, क्योंकि उस समय परीक्षा एक ही दिन में समाप्त हो जाती थी और उसी दिन सायंकाल मौसी के घर से हम तीनों लोग पैदल ही शाम को अपने गांव वापस आ गये। कक्षा-5 तक गांव में बहुत ही कठिनाईयों में पढ़ाई पूरी हुई। क्योंकि उस समय छोटे बच्चों को बहुत ही घरेलू कार्य भी करने पड़ते थे, जैसे सुबह उठकर खेतो में घास बीनना, ढेले फोड़ना, खेतो के कोन गोड़ने, और ज्वार, मक्का,चना व आम की फसल आदि की रखवाली करना तथा माता-पिता जो सुबह ही खेतों में काम करने के लिए चले जाते थे उन्हें नास्ता आदि देने जाने का काम हमें ही करना पड़ता था, उसके बाद ही स्कूल जाते थे।

       कक्षा-5 उत्तीर्ण करने के बाद गांव में उच्च शिक्षा हेतु स्कूल/कालेज नहीं थे, इस कारण  कक्षा-6 की पढ़ाई हेतु पिता जी द्वारा गांव से 05 कि0मी0 की दूरी पर जूनियर हाई स्कूल, बयारी गांव में दाखिला दिला दिया गया, क्योंकि इसके पूर्व मेरे बड़े भाई उसी स्कूल में पढ़ रहे थे, इसी कारण मेरा भी नाम उसी स्कूल में लिखवा दिया गया। मेरे साथ मेरे कुछ साथी जिनके कुछ नाम यहॉ पर उल्लेख कर रहा हॅॅूं जिनमें सुरेश प्रसाद, रघुवीर प्रसाद, सुभाष चन्द्र,अवधेश सिंह, मिथलेश सिंह, विमला सिंह, नीलम श्रीवास्वत, सुहैल अहमद, फहीम अहमद, शान्ती प्रकाश एवं रेशमा खान इतने लोग गांव से बयारी गांव पैदल रोज स्कूल जाते-आते थे। कक्षा-6 तक मात्र एक वर्ष पढ़ाई की वहॉ पर तीन शिक्षक तैनात थे सर्व श्री मुन्ना लाल, पन्नालाल पाण्डेय एवं बद्दरूद्दीन अली उन्हें सभी छात्र मोलबी साहब करते थे और मौलबी साहब मेरे ही गांव में पशुधन प्रसार अधिकारी (जानवर वाले डाक्टर साहब) के यहॉ पर रहते थे डाक्टर साहब के बच्चे मौलबी साहब के साथ ही स्कूल जाते आते थे और उन्हीं के साथ हम लोग भी कभी कभार साथ जाते-आते थे।

       हम और मेरे बडे़ भाई तथा मोहल्ले के सुरेश प्रसाद तीनों लोग सुबह 08 बजे घर से बासी खाना खाकर पैदल ही स्कूल जाते थे और शाम 5 बजे तक बिना खाये ही पढ़ाई करनी पड़ती थी। शाम होते होते इतनी जोर की भूख लगती थी कि चलना भी मुश्किल हो जाता था और ऊपर से किताबों का बोझ भी लादना होता था। स्कूल से लौटते वक्त रास्ते में जो खेत में फसल खड़ी होती जैसे मटर, गाजर, मूली गोभी, बैंगन, भिण्डी चना, गन्ना आदि खाने वाली चीजे खेतों से चुराकर खाते थे जिससे भूख शान्त होती थी और रास्ता तय करते थे।

                                                                                                                     आगे पढ़ें -------