Artikel Terbaru

पीतल का लोटा


आज स्कूल में काफी चहल-पहल दिख रही है, कई बच्चों के अभिभावक उनके साथ स्कूल आये हुए हैं। स्कूल का चपरासी हाथ में एक अद्द कागज लिये हुए इधर-उधर चक्कर लगा रहा है और कई बच्चे भी उसके आगे-पीछे चल रहे हैं। प्रधानाचार्य के कक्ष के बाहर भी काफी भीड़ जमा है और कई लोग आपस में बातचीत करके उलझ भी रहे हैं। मैंने भी उत्सुकतावश पास में खड़े लड़के से पूछा, भाई आज स्कूल में इतनी भीड़-भाड़ क्यों हैं और प्रधानाचार्य के कक्ष का घेराव क्यों किया गया।
पास में खड़े लड़के ने बताया कि आज यहाॅ पर स्कूल में पड़ने वाले गरीब बच्चों के लिये वजीफा हेतु फार्म भरवाये जा रहे हैं, इसीलिए आज कई बच्चों के अभिभावक भी बच्चों के साथ में स्कूल आयें हुए हैं। मैं भी कक्षा-7 में पढ़ाई कर रहा था, हमने भी प्रधानाचार्य जी से अपने वजीफा हेतु फार्म भरने का निवेदन किया गया। प्रधानाचार्य जी ने  मेरा भी वजीफा का फार्म भरा दिय गया और छः माह व्यतीत होने के उपरान्त प्रधानाचार्य द्वारा अवगत कराया गया कि आपका वजीफा आ गया है और वजीफा आन्ध्रा बैंक अमीनाबाद, लखनऊ में मिलेगा और वहीं पर सब बच्चों को चलना होगा।
यह बात मैेने घर में पिता जी से बतायी तो इन्होंने कहा कि हम भी तुम्हारे साथ लखनऊ चलेंगे, तुम अकेले इतनी दूर कहाॅ जाओगे। मैंने कहा कि स्कूल के सब बच्चों को अध्यापक महादेय लेकर जा रहे है, तो मैं भी उनके साथ ही चला जाऊॅगा, परन्तु वे नहीं माने और मेरे साथ स्कूल आ गये। अध्यापकों के बार-बार मना करने के बाजवूद वे मेरे साथ ही ट्रेक्टर पर सवार होकर स्कूल से लखनऊ के लिए रवाना हो गये। गर्मियों का मौसम था, बड़ी मुश्किल से लगभग 2 बजे अमीनाबाद पहुंचे, जिस बैंक में वजीफा मिलना था वह आन्ध्रा बैंक के नाम से थी और वह झण्डे वाले पार्क के सामने ही स्थित थी सो ट्रेक्टर वाले ने वहीं पार्क में हम लोगों को छोड़ दिया और हमारे अध्यापक महोदय उक्त बैंक में चले गये कुछ देर बाद हम लोगों के बैंक में हस्ताक्षर हुये और बैंक वाले ने कहा कि जाओ पैसा आपके अध्यापक महोदय को दे दिया जायेगा आप लोग स्कूल में अपना वजीफा अध्यापक से लेना और हम वापस पार्क में आ गये यह सारा कार्य होते-होते शाम के 5 बज गये।
इसी समय मेरे लेट्रिन लग गयी तो मैंने पिता जी से बताया तो उन्होंने कहा कि यहाॅ पार्क में कहाॅ करोगे चलो कहीं बम्बपुलिस/शौचालय ढूढ़ते है। शौचालय उसी पार्क के किनारे बना हुआ था परन्तु उस समय उनमें पानी नहीं आ रहा था तो पिता जी ने झोले में रखे पीतल के लोटे में नल से पानी भर कर लाये और कहा कि जाओ अब लैट्रिन कर आओ हम लोटा लेकर अन्दर गये और अपनी नेकर खोलकर जैसे ही बैठे कुछ शरारती लड़के अन्दर आ गये और मेरे सामने रखे लोटे को उठाकर भाग गये और मैं अपनी नेकर पकड़े हुए उनके पीछे भागा परन्तु वह बहुत तेजी से मेरा पीतल का लोटा लेकर भाग गये और मैं उन्हें नहीं पकड़ पाया परन्तु मेरे पिता मेरी बाहर रखवाली कर रहे थे उन्होनंे देखा कुछ लड़के पीतल का लोटा लिये हुए भाग रहे हैं और वह अपना लोटा पहचान गये इतने में क्या था कि पिता जी उन्हें दौड़ाकर गिरा दिया और अपना लोटा उनसे छीन लिया और दोबारा नल से पानी भर कर फिर शौचालय में आये तब जाकर मैंने शौच किया।
आज भी जब मैं अमीनाबाद जाता हॅू तो अपने पिता जी की बहुत याद आती है मुझे उस अतीत के दिनों की बहुत याद आती है कि आखिर पिता तो पिता ही होता इसीलिए पिता को आसमान से ऊॅचा दर्जा दिया गया है और मेरे पिता जी मेरे लिये आसमान से भी ऊॅचे थे। इस घटना को मैं जब याद करता हॅू तो मुझे बहुत हंसी भी आती और दुख भी होता है क्या थे वे दिन और आज भी मेरे दिल में अपने पिता जी के लिए वह त्याग मेरे लिये प्रेरणा का स्रोत है। उनके इन्ही त्याग और तपस्या से आज मैं आलीशान महल व लक्जरी गाड़ियों से घूमता हॅू। मैं उनके त्याग और समपर्ण को जीवनपर्यन्त कभी भी भूला नहीं सकता हॅू।
                                                                                                                       आगे पढ़ें -------