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टेरीकाट की शर्ट



इस वर्ष बरसात कम होने के कारण ठण्ड कुछ ज्यादा ही पड़ रही थी। वर्षा कम होने के कारण खरीफ की फसल की बुवाई समय से नहीं हो पायी जिससे गांव में सूखा पड़ गया था। बरसात न होने से गांव में खरीफ की फसल व समय से धान की रोपाई न होने के कारण सर्दियों में भुखमरी जैसे हालात उत्पन्न हो गये। इस हालात से निपटने के लिए गांव के काफी लोग मजदूरी करने के वास्ते शहरों की ओर पलायन कर गये।
मेरे भी घर की आर्थिक स्थिति उस वक्त काफी बिगड़ गयी और जब हालत काफी गम्भीर हो गये तो मेरे पिता जी भी लखनऊ मजदूरी करने के वास्ते गये। कुछ दिन मजदूरी करने के बाद लखनऊ से घर वापस आते समय उनके साथ वालों ने कहा कि चलो भाइयों जाड़े का वक्त है कुछ कपड़े नक्कास बाजार से बच्चों के लिए ले लेते हैं, सुना है कि इस बाजार में बहुत अच्छे-अच्छे कपड़े सस्ते दाम में मिल जाते हैं। सबके साथ पिता जी भी नक्कास बाजार गये और मेरे लिए वहीं से एक टेरीकाट का शर्ट मात्र 1.50 पैसे में लाये थे, वही शर्ट मैं पहन कर रोज स्कूल जाने लगा। जाड़े का समय था और स्कूल लौटते समय हमें काफी भूख लगी थी और मैं एक खेत में मटर की फलिया खाने लगा, उसी समय मेेरे मित्र सुरेश जो कि उन्ही का खेत था वे मेरे ऊपर बिगड़ गये और उन्होंने मटर की फलिया खाने से मना कर दिया, उनके मना करने के बावजूद मैं मटर की फलिया खाता रहा।
 इस पर उन्हें बहुत गुस्सा आ गया और उन्होनंे गंुस्से में आकर मेरी शर्ट पकड़ कर खेत के बाहर निकालने के लिए इतनी जोर से खंींचा कि मेरी शर्ट की एक आस्तीन पूरी तरह से फट गयी, जिसे देखकर वे बहुत डर गये और मैं रोने लगा कि तुमने मेरी शर्ट फाड़ दी, मेरे पिता मुझे बहुत डाटेगें और कल स्कूल कैसे जायेगें क्योंकि उस समय गांव में अधिकांश लोगों के पास एक ही कपड़ा होता था, वहीं पूरे सप्ताह पहनकर काम चलाते थे। शाम को मैं घर पहुंचा तो पिता जी और दादी जी ने मेरी फटी शर्ट देखी और पूछा कि तुमने शर्ट कैसे फाड़ दी। हमने खेत वाली पूरी घटना बतायी, इस पर पिता जी ने हमें बहुत डांटा और कहा कि ऐसे कपड़े फाड़ते रहे तो अब तुम बिना कपड़े के ही कल स्कूल जाना।
पिता जी ने सुरेश के पिता जी से शिकायत की और शर्ट के पैसे अदा करने को कहा, इस पर उनके पिता जी ने माफी मांगी और पैसे देने से मना कर दिया। उस घटना के बाद मैं एक सप्ताह तक बिना शर्ट के स्कूल नहीं जा सका। उसके बाद मेरी माता जी उसी शर्ट को किसी तरह अपने हाथों से सिलाई करके ठीक कर दिया जिसे पहन कर मैं अगले हफ्ते स्कूल जा सका। चूंकि सुरेश हमारे बहुत ही घनिष्ठ मित्र थे उनके बगैर हम एक पल भी अलग नहीं रह सकते थे परन्तु शर्ट को लेकर दोनों घरों में काफी तू-तू मैं-मै हो चुकी थी, इस कारण हम दोनों गांव में आपस मंे बात नहीं करते थे परन्तु जब मैं एक हफ्ते बाद स्कूल पहुंचा तो मेरे मित्र सुरेश मेरे पास आये और गले मिलकर उक्त घटना की माफी मांगी और उन्होंने कहा कि भाई आगे से ऐसी गलती नहीं होगी और तुम जितनी चाहों मटर की फलियां मेरे खेत में खा सकते हो, अब तुम्हें हम मना नहीं करेंगे।
हमने कहा चलो सुबह का भूला यदि शाम को वापस आ जाये तो उसे भूला नहीं कहते हैं और हम दोनों पहले की तरह साथ में हंसी ठिठोली और मस्ती करते हुए साथ-साथ पढ़ाई करने लगे। आज मेरे मित्र इस दुनिया मंें नहीं हैं। 24 वर्ष की ही उम्र में ही वर्ष 1988 में उन्होंने अपनी पारिवारिक परिस्थितियों के कारणों से आत्म हत्या कर ली थी। उस समय मैं लखनऊ मंे बी0ए0 प्रथम वर्ष की पढ़ाई कर रहा था उनकी मृत्यु की सूचना हमें जब मिली तो मेेेेरे मन को एकदम से झकझोर दिया और यकीन नही हुआ कि मेरे मित्र जो इतने सीधे और सादगी से रहते थे भला उन्होंने इतना बड़ा कदम कैसे उठा लिया जिसकी हम सपने में भी कभी कल्पना नहीं कर सकते थे, भगवान बड़ा कारसाज है और होनी कोई टाल नहीं सकता यही सोचकर मैने अपने मन को समझाया और दिल को दिलासा दिलाते हुए सोच लिया कि हमारा उनका साथ बस इतना ही था। अब उनकी स्मृतियाॅ ही मेरे मन में शेष बची हुई हैं। 
कक्षा-7 की पढ़ाई के लिए मेरे मोहल्ले के ही मेरे मित्र सुरेश प्रसाद जिनके मामा मवई कलाॅ में रहते थे, उन्होंने बताया कि मेरे मामा के गांव के आगे एक नया स्कूल बाबा हुलासी दास, शिक्षा संस्थान, मवई कला, रहीमाबाद, लखनऊ के नाम से खुला है, जो मेरे गांव से लगभग 14-15 कि0मी0 दूरी पर है और मेरे मामा ने कहा है कि आप आइये, हम आपका वही नाम लिखवा देते है और मेरे घर रहकर पढ़ाई करें। सुरेश प्रसाद ने कक्षा-7 में अपना नाम उक्त स्कूल में लिखवा लिया और अपने मामा जी के यहाॅ रहने लगा कुछ दिन बाद आया तो उसने उस स्कूल के बारे बहुत ही तारीफ की और कहा वहाॅ पर बहुत ही अच्छी पढ़ाई होती और अध्यापकगण रोज स्कूल आते हैं, इसलिए तुम भी वहीं चलो हम तुम्हारा भी नाम वहीं लिखवा देते हैं।
यह बात मंैने पिता जी से बतायी तो उन्होनें साफ मना कर दिया और कहा कि यह स्कूल काफी दूर है और रोज आने-जाने में काफी कठिनाई होगी, हम इतनी दूर तुम्हें नहीं भेजेगें। परन्तु अगले दिन मेरे बड़े भइया ने कहा कि जब स्कूल अच्छा है, तो चलो चलकर एक बार स्कूल जाकर देख ले लेते है और हम दोनों भाई अगले दिन सुबह ही स्कूल के लिए घर से बिना बताये ही पैदल निकल पड़े। स्कूल काफी दूर था, चलते-चलते हम दोनों काफी थक गये और जुलाई माह का महीना होने के कारण काफी धूप व गर्मी भी रही थी जिससे वहाॅ पहुंचने में काफी कठिनाई हुई।
क्योंकि हम लोगों को स्कूल का रास्ता पता नहीं था, पूछते-पूछते किसी तरह स्कूल पहुंचे और वहाॅ पर पहुंच कर मेरे मित्र सुरेश कुमार, जो पहले ही अपना नाम लिखवा चुके थे, वे वहाॅ पर मिले और उन्होंनें ही प्रधानाचार्य श्री लालता प्रसाद यादव जी से मिलवाया और मेरे नाम लिखने का अनुरोध किया।  प्रधानाचार्य ने 1.50 पैसे फीस प्रति माह बताई, जो उस समय काफी थी मेरे बड़े भाई साहब ने हाॅ कर दी और प्रधानाचार्य महोदय ने हम दोनो भाइयों के नाम लिख लिये और कहा कि फीस कल लिये आना और अपनी पढ़ाई चालू करें।
वहाॅ से लौटते-लौटते शाम हो गयी और हम लोग काफी थक भी गये थें। शाम को पिता को मालुम हुआ कि यह दोनों लोग बाबा हुलासी दास शिक्षा संस्थान मवई कला, रहीमाबाद में नाम लिखवा आयें है तो उन्होंने बहुत ही गुस्सा किया और कहा कि एक तो स्कूल बहुत दूर है और इतनी मंहगी फीस कहां से आयेगी। उक्त स्कूल काफी दूर है रोज आने-जाने में पैदल चलकर आओगे तो थक जाओगे और काफी समय लगेगा तब पढ़ाई कब करोगो, रहने दो, यहीं कही आस-पास के स्कूल में नाम लिखवा देंगे, उसी मे जाना और इतनी दूर हम तुम लोगों को नहीं भेजेगें। दादी और माता जी और छोटे दादा एवं चाची ने भी कहा कि स्कूल बहुत दूर है वहाॅ मत जाओ।
मैने और भइया ने कहा कि यहाॅ आस-पास कोई ढंग का स्कूल नहीं है और जो है भी उनमें पढ़ाई अच्छी नहीं होती है और यह स्कूल अभी नया-नया खुला है, इसमें काफी अच्छी पढ़ाई होती है, हम वहीं जायेगंे। काफी मसक्कत के बाद पिता जी और घर वाले तैयार हुए कहा ठीक है। कुछ दिन जा करके देखो, दूसरे दिन से हम लोग पैदल ही बासी खाना कर स्कूल के लिए निकल पड़े, एक दो दिन तो बहुत अच्छा लगा परन्तु पूरे हफ्ते जाने के बाद यही लगा कि पिता जी ठीक ही कर रहे थे कि इतनी दूर पढ़ने मत जाओं परन्तु हम लोगों को उस वक्त पढ़ने का जुनून था और वहाॅ पर फीस भी जमा हो चुकी थी। इसी बीच हमारे मित्र रघुवीर प्रसाद एवं सुभाष चन्द्र यह दोनों लोग भी बयारी गांव में ही साथ पढ़ते थे, से मुलाकात हुई और पूछने लगे अबकी बार कहाॅ नाम लिखवाया है।
 हमने बताया कि बाबा हुलासी दास शिक्षा संस्थान मवई कला रहीमाबाद में नाम लिखवा लिया है और वहीं पर एक हफ्ते से जा रहे हैं, तो ठीक हम भी वहीं पर लिखवाना चाहते हैं, तो क्या है तुम भी चलो, दूसरे दिन यह दोनों लोग ने भी उसी स्कूल में दाखिला ले लिया।  इसके बाद गांव के ही गुरू प्रसाद मौर्य एवं राम पाल मौर्य ने भी उसी स्कूल में दाखिला ले लिया गया। अब गांव से 07 लोग एक साथ पैदल जाते और आते थे। उक्त ंस्कूल पहुचने के लिए स्कूल से पहले ही एक बहुत ही बड़ा नाला पड़ता जिसे पार कर जाना होता था, बरसात के दिनों में तो उक्त नाले में बहुत ही पानी आ जाता था पुल न होेने के कारण जिसे कभी-कभी तैर कर उस पार जाना पड़ता था। कभी-कभी इतना तेज बहाव होता था कि तैरना भी मुश्किल होता तो लगभग 03 कि0मी0 की दूरी पर एक पुलिया बनी हुई थी वहाॅ से चलकर पार करते थे तब कहीं स्कूल पहंचते थे और उक्त नाले को कई बार पार करने में कई बच्चे डूबते हुए बचे जिसमें मैं भी था। बरसात में दो चार दिन लगतार यदि बरसात होती थी तो हम लोगों का अस्थायी स्कूल मवईकला गांव में लगता था और वहीं पर पढ़ाई होती थी। बड़े भइया वहाॅ सिर्फ एक वर्ष ही पढ़े और कक्षा आठ पास करके अपना नाम जनता हायर सेकेन्डरी स्कूल खड़ौहाॅ, मलिहाबाद मेें कक्षा-9 में नाम लिखवा लिया गया और वे गांव के अन्य बच्चों के साथ पैदल ही स्कूल जाने लगे। यहाॅ पर कक्षा-7 की एक घटना का मेरे द्वारा संक्षिप्त उल्लेख किया जा रहा है---                                 
                                                                                                                              आगे पढ़ें -------