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विज्ञान की कापी


वर्ष 1981 मार्च का महीन था, कक्षा आठ की वार्षिक परीक्षा नजदीक आने वाली ही थी और पढ़ाई बड़े जोरो से चल रही थी, हर एक अध्यपक अपने-अपने विषय की तैयारी में बड़ी ही मुस्तैदी से लगा हुआ था। हमारे विज्ञान के अध्यापक श्री सधालाल रावत बहुत सख्त मिजाज के अध्यापक थे, यदि उनके द्वारा दिया गया होमवर्क पूरा नहीं हुआ है तो वे डण्डों से पूरे फील्ड में दौड़ा-दौड़कर बहुत ही मारते थे। हमें विज्ञान मंे एक पाठ लिखने को दिया गया था और मेरे द्वारा उक्त होमवर्क को पूरा कर भी लिया गया, परन्तु सुबह स्कूल चलते समय मैं विज्ञान की कापी झोला में रखना भूल गया और बिना कापी लिये ही स्कूल चला गया। स्कूल पहुंचने पर मुंझे याद आया कि मैं तो विज्ञान की कापी घर से लाना ही भूल गया हॅू। 
यह जानकर मुझे बहुत दुख हुआ कि आज अध्यापक महोदय मुझे स्कूल में दौड़ा-दौड़ाकर मारेगें इसी सोच में मैं बैठा था, तभी मेरे एक मित्र आये और उदासी का कारण पूछा, तो मैंने उनको कापी वाली बात बतायी तो उन्होंने कहा कि चैथा धण्टा खाली है और विज्ञान का 7वाॅ घण्टा है चाहो तो तुम कापी घर से ला सकते हो ता,े मैंने कहा मित्र मेरा घर यहाॅं से लगभग 14-15 कि0मी0 की दूरी पर है और मैं पैदल ही आता-जाता हॅू। इस पर उसने कहा कि भाई अब तो बड़ी समस्या है और आगे कोई रास्ता नहीं है, चलो यार मास्टर साहब से कह देना कि मैं कापी घर पर भूल आया हॅू, तो हमने भी कहा कि हाॅ यही कहना पडे़गा और इसके अलावा चारा ही क्या है।
कुछ देर बाद मैंने अपने मित्र की बात का ख्याल आया कि क्यों न चैथे घण्टे से घर चला जाता हॅूं और कापी घर से ले आऊॅ और मैने यही किया स्कूल से पैदल ही भागता हुआ घर गया और 7वाॅ घण्टा प्रारम्भ होने से पूर्व मैं कापी लेकर स्कूल पहुंच गया। यह बात मैंने अपने मित्र को ही बतायी और किसी को इस बारे में नहीं बताया था। 
 कक्षा आठ की बोर्ड की परीक्षा हुई और उसमें मै प्रथम श्रेणी मंे पास हुआ, जिस दिन मार्कसीट का वितरण हुआ यह बात मेरे मित्र ने विज्ञान के अध्यापक श्री सधालाल जी से बतायी तो वह बहुत खुश हुए और उन्होंने मुझे डांटा यदि कापी भूल गये थे तो इतनी दूर लेने क्यों गये, मेेरे द्वारा कहा गया कि यदि मैं आपसे कहता कि कापी मैं भूल आया हॅू तो आप उस वक्त मेरी बात नहीं मानते और मुझे मारते। इस घटना की चर्चा उन्होंने स्कूल में प्रार्थना स्थल पर सारे स्कूल के बच्चों को बताया और कहा कि ऐसे परिश्रमी और ईमानदार कर्मठ तथा कर्तव्यनिष्ठ विद्यार्थी हमारे स्कूल में पढ़ते हैं और वह कक्षा आठ प्रथम श्रेणी उत्तीर्ण करने वाले ज्ञान प्रकाश हैं, तो बच्चों आप सब लोग इनसे प्रेरणा लें और इनका अनुसरण करें। उक्त स्कूल में मैं दो वर्ष कक्षा-7 एवं 08 की पढ़ाई की परन्तु उच्च शिक्षा का अभाव होने के कारण हमें वहाॅ से अपना नाम कटवाना पड़ा। उस स्कूल के अध्यापक हमें बहुत ही चाहते थे जिसमें श्री लालता प्रसाद यादव जो उस समय प्रधानाचार्य थे, वह हमें बहुत सारी भौतिक व व्यवहारिक ज्ञान की बातें अलग से बताते थ,े वह गुरू जी मूझे आज भी बहुत याद आते हैं, परन्तु जब से मैंने स्कूल छोड़ा तब से उनसे एक बार भी नहीं मिला, जिसे मुझे बहुत अफसोस है। 
वहाॅ के काफी दोस्त भी मुझसे विछड़ गये, कुछ आगे की पढ़ाई नहीं की और कुछ तो अन्य स्कूलों में चले गये, जिससे हमारे काफी दोस्तों से कक्षा आठ पास करने के बाद आज तक मुलाकात ही नहीं हुई, जिन्हें मैं बहुत याद करता हॅू। आज मुझे स्कूल के बीते हुए अतीत के पल याद करके बहुत ही मन रोमांचित हो जाता है। वह पेड़ों पर चढ़कर आम खाना व उन पर बैठकर खाना खाना या उनकी छाया में गुल्ली डण्डा खेलना आदि आज भी याद करके मन बहुत ही प्रसन्न होता है, कांश वह क्या दिन मस्ती भरे थे, न घर की चिन्ता और देश दुनिया की, गरीबी थी परन्तु खुशियाॅ बहुत थी। क्योंकि लोगों के पास समय ही समय था, आज लोंगों के पास पैसा है परन्तु प्यार-मोहब्बत एवं अपनो व दोस्तों के लिए लगाव बिलकुल नहीं है। ऐशों आराम की जिन्दगी जीने के लिए प्रत्येक व्यक्ति रात-दिन एक किये हुए है, परन्तु पैसा होने के बावजूद भी आज उस तरह की खुशिया नहीं मिल पाती जैसी उस वक्त थी।
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